
गुमानसिंह राव
रानीवाड़ा
सुणतर क्षेत्र के एक किसान ने कुछ वर्ष पूर्व १०० किलो उत्पादन के साथ सफेद मूसली की खेती शुरू की। अब वह २० क्विंटल तक ऊपज ले रहे हैं। धानोल निवासी प्रगतिशील किसान बाबूलाल चौधरी ने क्षेत्र के दूसरे किसानों के लिए एक मिसाल कायम की है।
आलू की भांति मेढ़ों पर सफेद मूसली की बुवाई बरसात से पहले की जाती है जाड़े में निराई-गुड़ाई के बाद करीब ९ माह के बाद गर्मी में पत्तियां सूख जाने पर उत्पादन लिया जाता है। अब क्षेत्रीय किसानों का रुझान आयुर्वेद से संबंधित जड़ीबूटियों की खेती की तरफ बढ़ रहा है। बाबूलाल का कहना है कि वर्ष 200६ में नागौर जिले के लाडनूं से वे 20 किलो सफेद मूसली का रोप लाकर रोपा था। हर वर्ष वे इसमें बढ़ोतरी करते गए। मौजूदा समय में पांच बीघा खेत में २० क्विंटल सफेद मूसली की खेती हो रही है। क्लोरो फाइटम बोरिबेलियम के वैज्ञानिक नाम वाले इस सफेद मूसली को भारत में शक्तिवर्धक के रूप में पहचान मिली है। यहां की सफेद मूसली की मांग विदेशों में अत्यधिक है, लेकिन सफेद मूसली का उत्पादन कर रहे क्षेत्र के किसानों को अभी कुछ अड़चने आ रही हैं। सरकार द्वारा सफेद मूसली की खेती को बढ़ावा नहीं दिया गया और न ही इसके लिए कोई बाजार ही निर्धारित किया गया है। शेष & पेज 9 पर
चौधरी ने बताया कि पांच वर्ष पूर्व सफेद मूसली के बीज की कीमत छह सौ रुपए प्रति किलो थी, लेकिन अब इसका दाम बढ़कर 16 सौ रुपए प्रति किलो हो गया है। उन्होंने किसानों को सलाह दी है कि परख कर अच्छे बीज की रोपाई की जाए तो प्रति बीघे चार क्विंटल सफेद मूसली की पैदावार की जा सकती है। इससे एक तरफ जहां परम्परागत कृषि को छोड़कर किसान औषधीय पौधों की खेती की ओर आकृष्ट होने लगे हैं, वहीं उच्च शिक्षा प्राप्त ऐसे युवक भी, जो अभी तक खेती-किसानी के कार्य को केवल कम पढ़े-लिखे लोगों का व्यवसाय मानते थे, औषधीय पौधों की खेती अपनाकर स्वयं को गौरवान्वित महसूस करने लगे हैं।
यह है घटक
सफेद मूसली में कार्बोहाईड्रेट्स 42 प्रतिशत, प्रोटीन 8 से 9 प्रतिशत, सैपोजिन्स 2 से 17 प्रतिशत, रेशा 3 से 4 प्रतिशत, एल्कलोंयड्स 25, विटामिन ए, बी, डी तथा ई, ग्लूकोसइड्स, अमीनो अम्ल स्टरयोरड्स आदि और खनिज लवण 7 से 15 प्रतिशत तक पाए जाते हैं। सैपोजिन्स की मात्रा के आधार पर ही इसका मूल्य निर्धारण होता है।
क्या है फायदा
मात्र 6 से 8 माह में प्रति एकड़ एक से दो लाख रुपए का शुद्ध लाभ देने वाली और कोई फसल नहीं है। इसकी किसी प्रकार की प्रोसेसिंग करने की आवश्यकता नहीं, कोई मशीन लगाने की जरूरत नहीं। इसे किसान सीधे उखाड़ कर, छील कर तथा सुखा कर बेच सकते हैं। सफेद मूसली के लिए व्यापक बाजार उपलब्ध है। इसलिए इसकी खेती रोजगार का एक सुनहरा अवसर उपलब्ध कराती है। मौसम में परिवर्तन से इस पर कोई असर नहीं पड़ता। सफेद मूसली की खेती पूरे राजस्थान में की जा सकती है।
अनुकूल है वातावरण
सफेद मूसली के उत्पादन के लिए उष्ण व उपोष्ण कटिबन्धीय जलवायु की आवश्यकता होती है यही कारण है कि यह अरावली की पहाङियों में विशेष रूप पाई जाती है चूंकि यह कठोर प्रकृति का पौधा है इसलिए इसे विभिन्न प्रकार की जलवायु में उगाया जा सकता है। मूसली की फसल में प्राय: कोई विशेष बीमारी नहीं देखी गयी है अत: इसमें किसी प्रकार के कीटनाशकों का उपयोग करने की कोई जरूरत नहीं है। इसका प्रमुख कारण यह है कि पौधे का कन्द भूमि में नीचे रहता है। इस फसल पर किन्ही प्राकृतिक आपदाओं जैसे ओलावृष्टि, पाला, और कुहासा आदि का प्रभाव नहीं हो पाता। वैसे यह पैाधा किसी प्रकार की बीमारी या प्राकृतिक आपदाओं के प्रभाव मुक्त है।
औषधीय उपयोग
सफेद मूसली शक्तिवर्धक, मेधावर्धक, प्रसवोपरान्त शारीरिक क्षतिपूर्ति, हृदय दुर्बलता, टॉनिक स्वरूप, बुढ़ापे में कमजोरी दूर करने वाली प्रसिद्ध औषधि, प्रजनन क्षमता में वृद्धि के लिए उपयोगी, माताओं में दूध बढ़ाने के लिए भी उपयोगी है। सफेद मूसली को 'दूसरी शिलाजीतÓ की संज्ञा दी जाती है, चीन, उत्तरी अमेरिका में पाए जाने वाले पौधे जिन्सेंग का विकल्प माना गया है विदेशों में इससे कैलांग जैसे फ्लेक्स बनाए जाते हैं जिनका पौष्टिक नाश्ते के रूप में उपयोग किया जाता है।
विपणन की व्यवस्था
धानोल में कार्य लाडनूं औषधीय पादप एंड प्रौसेसिंग सहकारी समिति के द्वारा हो रहा है। समिति के प्रबंध निदेशक विजेंद्र विश्रोई ने बताया कि समिति किसान को ५०० सौ रुपए प्रति किग्रा के अनुसार बीज उपलब्ध करवाती है तथा ५०० सौ रुपए के हिसाब से गीली मूसली किसान से खरीद करती है। इस तरह किसान को चार गुनी आय होती है। कम जमीन में ज्यादा पैदावार होने से क्षेत्र में यह फसल लोकप्रिय होती जा रही है।
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