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Wednesday, 22 December 2010

झील सी सुंदरता पर बबूल का दाग

राव गुमानसिंह 
रानीवाड़ा!
प्रकृति इस बार तहसील क्षेत्र पर जमकर मेहरबान हुई है। चारों ओर जहां पहाड़ हरियाली से घिरे नजर आते हैं वहीं क्षेत्र के झरनों से आज भी कलकल करता पानी बह रहा है। प्रकृति की इसी मेहरबानी से क्षेत्र का वणधर बांध में इन दिनों झील सा झूमता नजर आ रहा है। पिछले साल तक सूख चुके इस बांध में इस बार पानी की इतनी आवक हुई है कि यहां ना केवल मछली पालन हो रहा है बल्कि पर्यटकों के लिए नौकायन का भी अवसर है। ऐसे में यहां पर्यटन की संभावनाओं से इंकार नहीं किया जा सकता, लेकिन इस मनोहारी केंद्र को भी सरकारी बेपरवाही का खामियाजा भुगतना पड़ रहा है। बांध के चारों ओर जहां जगह जगह बबूल खड़ा है वहीं कई लोग अवैध रूप से मशील लगाकर इसका पानी खींच रहे हैं। जिसे रोकने के लिए कोई इंतजाम नहीं किए गए हैं। प्रकृति मेहरबानी, प्रशासन बेपरवाह : इस बांध पर भले ही प्रकृति मेहरबान हो गई हो, लेकिन सरकारी उदासीनता यहां भी दिखाई दे रही है। बांध के चारों ओर बबूल की झाडिय़ां उग आई हैं। जिसके कारण यहां गंदगी रहती है। अगर इन झाडिय़ों को साफ कर दिया जाए तो यहां का सौंदर्य और भी निखर सकता है। बांध के तल में भी बबूल होने के कारण नाव संचालन में परेशानी आती है। इसके अलावा कुछ लोग यहां अवैध रूप से मशीन लगाकर पानी खींचने का भी काम रहे हैं। जिस पर भी अंकुश जरूरी है। स्थानीय लोगों ने कई बार इस संबंध में सिंचाई विभाग को ज्ञापन भी सौंपा है। 

पर्यटन की हैं संभावनाए

रानीवाड़ा तहसील क्षेत्र में वन्य जीव, धार्मिक और ऐतिहासिक ट्यूरिज्म की अपार संभावनाएं हंै, लेकिन इस धरोहर को पर्यटन के लिहाज से न तो सरकार समझ पाई और न ही निजी क्षेत्र। सरकार ने भी पर्यटन सर्किट पर कम ध्यान दिया है। रानीवाड़ा व जसवंतपुरा पहाड़ों और जगलों की गोद में बसे हैं। दोनो क्षेत्रों में कई प्रसिद्ध पर्यटन स्थल हंै। रानीवाड़ा तहसील में वणधर व जेतपुरा बांध, सेवाड़ा का पातालेश्वर शिव मंदिर, सिलासन का सिलेश्वर मंदिर, वणधर की प्राचनी वावड़ी, कोटड़ा का आंद्रेश्वर मंदिर, कूड़ी महादेव मंदिर, रानीवाड़ा खुर्द के पहाड़ पर बिल्व वृक्षों का वन, बारहमासी सुकळ नदी, बडग़ांव गढ़ एवं जसवंतपुरा क्षेत्र में सुंधामाता मंदिर, भालू अभ्यारण्य, खोडेश्वर शिव मंदिर, कारलू बोटेश्वर मंदिर, जसवंतपुरा पर्वत पर मिनी माउंट समेत दर्जनों स्थल हैं। जहां हर साल सैकड़ों लोग आते हैं।

फिर होने लगा मछली उत्पादन

बांध में आया पानी यहां के लोगों के लिए रोजगार के नए अवसर लेकर आया है। कुछ सालों पूर्व तक बांध में मछली उत्पादन होता था, लेकिन बीच में बरसात की कमी के कारण यह काम बंद करना पड़ा। इस साल हुई बरसात के बाद आए पानी में अब एक बार फिर यहां मछली उत्पादन किया जा रहा है। इसके लिए यहां बाकायदा निविदा की गई है। जिसके बाद ठेकेदार ने बांध में मछली के बीज छोड़े हंै। अभी मछली का आकार छोटा है। फरवरी माह के बाद मछली बड़ी होने पर जाल से उन्हें एकत्रित किया जा सकेगा। इसी प्रकार यहां नौकायन का भी काम शुरू किया है। शुरू शुरू में नाव संचालन मछली उत्पादन के लिए किया जा रहा था, लेकिन अब यहां आने वाले लोगों की फरमाइश पर उन्हें भी इसकी सैर करवाई जाती है। लबालब भरे बांध में लोगों के लिए नाव में सफर करना रोमांचकारी होता है। फोटोग्राफी के शौकिन लोगों को यहां की साइट पसंद आने लगी है।

बांध के संरक्षण के लिए प्रयास कर कार्ययोजना बनानी चाहिए

-बांध के खूबसूरत किनारें पर्यटकों को लुभाने के लिए पर्याप्त हंै। सरकार एवं जिला प्रशासन को यहां पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए प्रयास कर कार्ययोजना बनानी चाहिए।

- मोड़ाराम मेघवाल, वणधर



-बांध में जंगली बबूल झाड़ी का रूप ले रहे हंै। जो कि इसकी सुंदरता के लिए दाग है। प्रशासन को बांध के सरंक्षण व संवर्धन के प्रयास करने चाहिए।

- पृथ्वीसिंह राठौड़, मछली पालक, वणधर

Wednesday, 30 June 2010

रानीवाड़ा में टर्की की भेड़ पर प्रयोग


रानीवाड़ा
खेती किसानी में नए सफल शोध व प्रयोग के बाद अब पशुपालन में भी सुणतर क्षेत्र नए मुकाम तय करने में जुटा है। मैत्रीवाड़ा गांव के एक किसान ने देशी भेड़ की जगह अब सुदूर टर्की देश से भेड़ें मंगवा कर पशुपालन क्षेत्र में नई क्रांति लाने का प्रयास किया है। काफी महंगी माने जाने वाली इस ब्रीड की चर्चा क्षेत्र में जोरों पर है। उपख्ंाड क्षेत्र के मैत्रीवाड़ा गांव के रणजीतसिंह देवड़ा ने यहां यह प्रयोग करने का प्रयास किया है। इसके अलावा भी यहां अन्य कई पशुओं की विदेशी नस्ल का प्रयोग किया जा रहा है। देवड़ा ने बताया कि उनके पास देशी भेड़ों की काफी तादाद थी। इस बीच टर्की की उन्नत नस्ल की भेड़ की जानकारी मिली तो इस नस्ल की भेड़ों को भी यहां लाकर प्रयोग किया जा रहा है। पशुपालन विभाग के डॉ. मुकेश पटेल की देखरेख में वहां से मंगवाए गए टर्की के भेड़ के जोड़े की देखभाल की जा रही है। अगर यहां यह प्रयोग सफल होता है तो यकीनन इससे भविष्य में पशुपालकों की हालत में सुधार आएगा।

क्या हैं विशेषताएं

टर्की की इस नस्ल में मांस व दूध की तादाद ज्यादा होती है। देशी भाषा में इसे थुंबा कहा जाता है। इसकी पूंछ बहुत ही छोटी व मांसल होती है। पूंछ की जगह मांसल भाग पीछे की ओर लटकता है। डॉ. पटेल के अनुसार भेड़ों में ऊन की मात्रा कम ही होती है। इस कारण से मारवाड़ में इसका प्रचलन कम ही होता है। देशी नस्ल की तुलना में इसकी ऊंचाई ज्यादा होती है। एक व्यस्क भेड़ का वजन ८० किलो अनुमानित होता है, जो कि देशी भेड़ की तुलना में काफी ज्यादा होता है। हालांकि यह नस्ल बहुत ज्यादा महंगी होने से आम लोगों के लिए सपने जैसी होती है। एक नर भेड़ की कीमत अनुमानित ७० से ८० हजार मानी जाती है। मतलब यह देशी भेड़ की तुलना में १० गुना ज्यादा होती है। महंगी होने के बावजूद अपनी कुछ विशेषताओं के कारण ये भेड़ पशुपालकों के लिए मुनाफे का सौदा माना जाती है।