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Sunday, 11 July 2010
बारिश के बाद खेतों में चले हल
उपखंड में बारिश के साथ ही बुवाई का दौर आरम्भ हो चुका है। पिछले दो दिन में क्षेत्र में हजारों हेक्टेयर में बुवाई हुई है। मरुधरा के लिए पिछले तीन दिन खुशी का पैगाम लेकर आए। इस दौरान सुणतर, परगना, देवल पट्टी व काबा पट्टी बेल्ट में अच्छी बारिश हुई। ऐसे में पिछले साल अकाल की पीड़ा सह चुके किसानों के चेहरों पर भी खुशियां छा गईं।
खेतों की रौनक लौटी
खेतों की रोनक भी बारिश के चलते लौट आई है। कल तक जो खेत सूने-सूने थे वहां अब हल चल रहे हैं तो किसानों के परिवार भी पहुंचने लगे हैं। कई गांवों में सूनी पड़ी ढाणियों में भी जीवन लौट आया है। अब तक लक्ष्य के मुकाबले क्षेत्र में कम बुवाई हुई है, लेकिन बारिश के बाद लक्ष्य पूरा होने की उम्मीद बंधी है। क्षेत्र में बाजरा, मूंग, ग्वार, मोठ, अरण्डी, तिल, ज्वार, मुंगफली की बुवाई की गई है। सहायक कृषि अधिकारी कन्हैयालाल विश्नोई ने बताया कि बारिश का दौरा शुरू होनेे से क्षेत्र में लक्ष्य पूरा होने की उम्मीद है। पिछले दो-तीन दिन से बुवाई में तेजी आई है।
Monday, 28 June 2010
सेल टैक्स की चोरी
उनकी बिल्टी में चावल का भूसा और अन्य वस्तु बताई जाती है, जबकि उसमे विद्युत उपकरण, गुड़, डेयरी घी, तेल व शक्कर आदि सामान होता है। इस प्रकार के सामान की हर रोज 20-25 ट्रक आती है। जिससे वाणिज्य कर विभाग को टैक्स के रूप में हजारों की चपत लग रही है। इसी तरह निजी और रोडवेज की बसों में भी बिना बिल्टी का सामान आ रही है। जिससे टैक्स चोरी हो रही है।
करेंगे कार्रवाई
रानीवाड़ा सहित सीमावर्ती क्षेत्रों से विभाग की चौकियां हटा दी हैं तथा उड़न दस्ता भी नहीं है। इस वजह से दिक्कत आ रही है। इसके बावजूद हम बिना बिल्टी के सामान लाने वालों के विरूद्ध कार्रवाई करेंगे।
- प्रेमसिंह आढ़ा, सहायक वाणिज्यिक कर अधिकारी, भीनमाल
Saturday, 22 May 2010
कागमाला में चौपाल सम्पन्न
निकटवर्ती कागमाला ग्रामपंचायत मुख्यालय की रामावि में रात्री कालीन ग्रामीण चौपाल का आयोजन एसडीएम कैलाशचंद्र शर्मा की अध्यक्षता में सम्पन्न हुआ। चौपाल में उपस्थित विभागीय अधिकारियों के द्वारा योजनाओं की प्रगति की समीक्षा कर ग्रामीणों से रूबरू होकर उनकी समस्याओं का निराकरण किया गया। शर्मा ने बताया कि भीलों की ढाणी कागमाला में पेयजल की व्यवस्था को लेकर जसवंतपुरा जलदाय विभाग के एईएन श्यामसुदंर शर्मा को तुरंत समस्या के निस्तारण के लिए पाबंद किया गया। राप्रावि चौधरियों की ढाणी चाण्डपुरा का नाम परिवर्तित करने तथा माध्यमिक विद्यालय में खेल-मैदान की भूमि के आवंटन संंबंधित कार्यों को ग्राम पंचायत में प्रस्ताव पारित कर पंचायत समिति में भिजवाने को लेकर सरपंच व ग्रामसेवक को निर्देश दिए गए।
शर्मा ने ग्रामीणों से कहा कि विभागीय योजनाओं की जानकारी लेकर पात्र व्यक्तिओं से लाभ प्राप्त करने के लिए आवेदन करवाने तथा फायदा उठाने की अपील की गई। अधिकारियों को ग्रामीणों की समस्याओं को ध्यान में रखकर समाधान करवाने की बात कही। जिस परीवार में बुर्जुगों की सार संभाल उनके परिजन नही कर रहे है, उनकी सहायता के लिए राज्य सरकार संकल्परत है। ऐसे बुर्जुग सहयोग के लिए एसडीएम कोर्ट में आवेदन कर सकते है। सरकार उनके पोषण की व्यवस्था करवाएगी।
ब्लॉक सीएमओं डॉ. आत्मराम चौहान ने टीकाकरण, जननी सूरक्षा योजना सहित अन्य स्वास्थ्य विभाग की योजनाओं के बारे में जानकारी दी। बीडीओं ओमप्रकाश शर्मा ने नरेगा, इंद्रावास एवं पंचायती राज की विभिन्न योजनाओं के बारे में बताया। सीडीपीओं संतोष शर्मा ने आंगनवाड़ी केंद्रों पर पोष्टिक आहार के बारे में जानकारी दी। इस अवसर पर विभिन्न सरकारी विभागों के अधिकारियों सहित ग्रामसेवक, पटवारी, पशुधन सहायक, साक्षरता खंड समन्वयक ताराचंद भारद्वाज, समाजसेवी रायमलदेवासी, भूताराम भील, मोहनलाल सैन, प्रकाश कुमार, प्रतापसिंह सहित कई जनों ने भाग लिया।
Sunday, 21 March 2010
सफेद मूसली ने बदली तकदीर

गुमानसिंह राव
रानीवाड़ा
सुणतर क्षेत्र के एक किसान ने कुछ वर्ष पूर्व १०० किलो उत्पादन के साथ सफेद मूसली की खेती शुरू की। अब वह २० क्विंटल तक ऊपज ले रहे हैं। धानोल निवासी प्रगतिशील किसान बाबूलाल चौधरी ने क्षेत्र के दूसरे किसानों के लिए एक मिसाल कायम की है।
आलू की भांति मेढ़ों पर सफेद मूसली की बुवाई बरसात से पहले की जाती है जाड़े में निराई-गुड़ाई के बाद करीब ९ माह के बाद गर्मी में पत्तियां सूख जाने पर उत्पादन लिया जाता है। अब क्षेत्रीय किसानों का रुझान आयुर्वेद से संबंधित जड़ीबूटियों की खेती की तरफ बढ़ रहा है। बाबूलाल का कहना है कि वर्ष 200६ में नागौर जिले के लाडनूं से वे 20 किलो सफेद मूसली का रोप लाकर रोपा था। हर वर्ष वे इसमें बढ़ोतरी करते गए। मौजूदा समय में पांच बीघा खेत में २० क्विंटल सफेद मूसली की खेती हो रही है। क्लोरो फाइटम बोरिबेलियम के वैज्ञानिक नाम वाले इस सफेद मूसली को भारत में शक्तिवर्धक के रूप में पहचान मिली है। यहां की सफेद मूसली की मांग विदेशों में अत्यधिक है, लेकिन सफेद मूसली का उत्पादन कर रहे क्षेत्र के किसानों को अभी कुछ अड़चने आ रही हैं। सरकार द्वारा सफेद मूसली की खेती को बढ़ावा नहीं दिया गया और न ही इसके लिए कोई बाजार ही निर्धारित किया गया है। शेष & पेज 9 पर
चौधरी ने बताया कि पांच वर्ष पूर्व सफेद मूसली के बीज की कीमत छह सौ रुपए प्रति किलो थी, लेकिन अब इसका दाम बढ़कर 16 सौ रुपए प्रति किलो हो गया है। उन्होंने किसानों को सलाह दी है कि परख कर अच्छे बीज की रोपाई की जाए तो प्रति बीघे चार क्विंटल सफेद मूसली की पैदावार की जा सकती है। इससे एक तरफ जहां परम्परागत कृषि को छोड़कर किसान औषधीय पौधों की खेती की ओर आकृष्ट होने लगे हैं, वहीं उच्च शिक्षा प्राप्त ऐसे युवक भी, जो अभी तक खेती-किसानी के कार्य को केवल कम पढ़े-लिखे लोगों का व्यवसाय मानते थे, औषधीय पौधों की खेती अपनाकर स्वयं को गौरवान्वित महसूस करने लगे हैं।
यह है घटक
सफेद मूसली में कार्बोहाईड्रेट्स 42 प्रतिशत, प्रोटीन 8 से 9 प्रतिशत, सैपोजिन्स 2 से 17 प्रतिशत, रेशा 3 से 4 प्रतिशत, एल्कलोंयड्स 25, विटामिन ए, बी, डी तथा ई, ग्लूकोसइड्स, अमीनो अम्ल स्टरयोरड्स आदि और खनिज लवण 7 से 15 प्रतिशत तक पाए जाते हैं। सैपोजिन्स की मात्रा के आधार पर ही इसका मूल्य निर्धारण होता है।
क्या है फायदा
मात्र 6 से 8 माह में प्रति एकड़ एक से दो लाख रुपए का शुद्ध लाभ देने वाली और कोई फसल नहीं है। इसकी किसी प्रकार की प्रोसेसिंग करने की आवश्यकता नहीं, कोई मशीन लगाने की जरूरत नहीं। इसे किसान सीधे उखाड़ कर, छील कर तथा सुखा कर बेच सकते हैं। सफेद मूसली के लिए व्यापक बाजार उपलब्ध है। इसलिए इसकी खेती रोजगार का एक सुनहरा अवसर उपलब्ध कराती है। मौसम में परिवर्तन से इस पर कोई असर नहीं पड़ता। सफेद मूसली की खेती पूरे राजस्थान में की जा सकती है।
अनुकूल है वातावरण
सफेद मूसली के उत्पादन के लिए उष्ण व उपोष्ण कटिबन्धीय जलवायु की आवश्यकता होती है यही कारण है कि यह अरावली की पहाङियों में विशेष रूप पाई जाती है चूंकि यह कठोर प्रकृति का पौधा है इसलिए इसे विभिन्न प्रकार की जलवायु में उगाया जा सकता है। मूसली की फसल में प्राय: कोई विशेष बीमारी नहीं देखी गयी है अत: इसमें किसी प्रकार के कीटनाशकों का उपयोग करने की कोई जरूरत नहीं है। इसका प्रमुख कारण यह है कि पौधे का कन्द भूमि में नीचे रहता है। इस फसल पर किन्ही प्राकृतिक आपदाओं जैसे ओलावृष्टि, पाला, और कुहासा आदि का प्रभाव नहीं हो पाता। वैसे यह पैाधा किसी प्रकार की बीमारी या प्राकृतिक आपदाओं के प्रभाव मुक्त है।
औषधीय उपयोग
सफेद मूसली शक्तिवर्धक, मेधावर्धक, प्रसवोपरान्त शारीरिक क्षतिपूर्ति, हृदय दुर्बलता, टॉनिक स्वरूप, बुढ़ापे में कमजोरी दूर करने वाली प्रसिद्ध औषधि, प्रजनन क्षमता में वृद्धि के लिए उपयोगी, माताओं में दूध बढ़ाने के लिए भी उपयोगी है। सफेद मूसली को 'दूसरी शिलाजीतÓ की संज्ञा दी जाती है, चीन, उत्तरी अमेरिका में पाए जाने वाले पौधे जिन्सेंग का विकल्प माना गया है विदेशों में इससे कैलांग जैसे फ्लेक्स बनाए जाते हैं जिनका पौष्टिक नाश्ते के रूप में उपयोग किया जाता है।
विपणन की व्यवस्था
धानोल में कार्य लाडनूं औषधीय पादप एंड प्रौसेसिंग सहकारी समिति के द्वारा हो रहा है। समिति के प्रबंध निदेशक विजेंद्र विश्रोई ने बताया कि समिति किसान को ५०० सौ रुपए प्रति किग्रा के अनुसार बीज उपलब्ध करवाती है तथा ५०० सौ रुपए के हिसाब से गीली मूसली किसान से खरीद करती है। इस तरह किसान को चार गुनी आय होती है। कम जमीन में ज्यादा पैदावार होने से क्षेत्र में यह फसल लोकप्रिय होती जा रही है।
Sunday, 14 March 2010
केसर से होने लगी कमाई
रानीवाड़ा!धानोल के एक खेत में कश्मीर का केसर खुशबु बिखेर रहा है। रंग बिरंगें फुलों की छटा यहां देखते ही बनती है।
केसर क्यारियों के कारण आस-पास के खेतों में इसकी खुशबु महक रही है। गांव के केवाराम चौधरी ने करीब तीन माह पूर्व अपने खेत में एक बीघा कृषि भूमि में माउंट आबू की ब्रह्माकुमारी संस्था से केसर के बीज लाकर उगाए थे। अब इन बीजों से पौधे बन गए हैं जो केसर के फूलों से महक रहे हैं। गौरतलब है कि इससे पूर्व भास्कर ने बताया था कि क्षेत्र के किसान खेतों में केसर उगा रहे हैं और उनका यह प्रयोग सफल होता है तो इससे किसानों की तकदीर भी बदल सकती है। अब जैसे जैसे केसर पर फूल आ रहे हैं। किसानों के चेहरे भी खिल रहे हैं। क्षेत्र में केसर की खेती सभी किसानों के लिए चर्चा का विषय बनी हुई है।
प्रगतिशील किसान चौधरी ने प्रथम में प्रयोग कर सफलता प्राप्त की है। उन्होंने अब केसर उतारना शुरू कर दिया है। इतना ही नहीं आधा किलों केसर डीसा के बाजार में पचास हजार रूपए प्रतिकिलों के भाव से बेची भी है। चौधरी ने बताया कि कश्मीर की जैसी जलवायु इस क्षेत्र की नही है, फिर भी ऐसी भौगोलिक परिस्थितियों में भी केसर की खेती आशा के अनुरूप खरी उतरी है। एक बीघा जमीन में दो किलो केसर निकलने की संभावना है। इस खेती में कम लागत से ज्यादा आमदनी हो रही है।
किसानों के लिए प्रेरणा बनी फसल
कृषि विभाग के अधिकारी कन्हैयालाल विश्नोई ने बताया कि निसंदेह धानोल में केसर की खेती हो रही है, परंतु कश्मीर जैसी जलवायु नहीं मिलने के कारण गुणवत्ता के मामले में कुछ कम है। इस केसर की खेती की सफलता को देखते हुए काफी किसानों ने अब चौधरी की राह अपनाने का निर्णय लिया है। इस वर्ष नवंबर महिने में काफी किसान सुणतर क्षेत्र के काफी किसान अपने खेतों में केसर उगाएंगे। बकौल, चौधरी ने बताया कि उनके इस प्रयोग का निरीक्षण करने के लिए गुजरात की दांतीवाड़ा कृषि विश्वविद्यालय की टीम ने दौरा किया। उनके द्वारा दिए गए दिशा निर्देशन में इस खेती की सार-संभाल करने पर ही यह प्रयोग सफल हो पाया है। इस खेती से किसान को डेढ़ लाख रूपए आय होने की संभावना है।
Sunday, 7 March 2010
सुणतर का आलू पहुंचेगा कनाडा
रानीवाड़ा।
सुणतर क्षेत्र के जाखड़ी ग्राम का आलु अब कनाड़ा जाने की तैयारी कर रहा है। केंद्र सरकार के द्वारा कान्ट्रेक्ट फार्मिंग योजना शुरू होने से ही इस कार्य को अमलीजामा पहनाया जा रहा है। यह कार्य जाखड़ी के प्रगतिशील व शिक्षित किसान महेंद्रसिंह पुत्र वनेसिंह देवड़ा ने कर दिखाया है। इतना ही नही तीन महिने में तीनगुनी कमाई कर क्षेत्र के किसानों के लिए प्रगति की नई राह दिखाने में सफलता प्राप्त की है।
कैसे हुई शुरूआत - कनाड़ा की मैक्कन कंपनी जिसका विश्व के आलु उत्पादन क्षेत्र में पांच प्रतिशत एकाधिकार है, उससे कॉन्टेक्ट फार्मींग का एग्रीमेंट कर डेढ हैक्टर जमीन में कंपनी का बीज लगाकर क्षेत्र में प्रथम प्रयोग किया। कंपनी के द्वारा प्रमाणित बीज को कंपनी के अधिकारियों की देख-रेख में जाखड़ी के देवड़ा कृषि फार्म में नवबंर माह में बुवाई की गई। अनूकुल भोगोलिक जलवायु होने की वजह से डिसा, गुजरात को भी आलु के उत्पादन में जाखड़ी ने पीछे छोड दिया। वहां एक किलो आलु की बुवाई से दस किलो आलु पैदा होते है, वही जाखड़ी में १४ किलो आलु पैदा हुए है। वजन में यहां का आलु औसतन चार सौ से छ: सौ ग्राम के बीच माना गया है, जोकि अति उत्तम क्वालिटी है।
कांन्टे्रक्ट की शर्ते - जाखड़ी में कंपनी ने किसान को साढे पांच रूपए किलों की दर तय की। इस दर से कंपनी किसान से यह आलु खरीद कर कनाड़ा सहित दौ सौ देश में निर्यात करेगी। यदि किसान इस आलु को ज्यादा दर पर बाजार में बैचना चाहे तो भी कंपनी के द्वारा इसकी छुट दी गई है। यदि बाजार में साढे पांच रूपए की दर से भी कम दर चल रही है, तो भी कंपनी किसान को निर्धारित दर अर्थात साढे पांच रूपए प्रतिकिलो भाव ही देगी। आलु की पैदावार की बुवाई व निकासी सहित ट्रांसपोटेशन का व्यय भी कंपनी ही करेगी। पैकेजिंग सामग्री भी कंपनी के द्वारा किसान को दी जाएगी।
क्या है खासियत - इस आलु में शर्करा की मात्रा कम होने के कारण स्वाद में फीका है। मधुमेह के मरीजों के लिए यह आलु कम नुकसानदायक माना जाता है। इसलिए इस आलु को मैकन कंपनी फं्रेच फ्राई व फिंगर चिप्स का रूप देकर विश्व की पांच सितारा होटलों में सप्लाई करती है। कंपनी की दौ सौ देशों में शाखाए है। इस किस्म के आलु की फसल में रोग नही लगने से किसानों को राहत महसूस होती है, साथ ही खरपतवार से भी छुटकारा मिलता है। फसल को मिनी स्प्रिकंलर सिस्टम से सिंचाई की जाए, तो बेहतर पैदावार प्राप्त होती है। किसान ने इस फसल को तैयार करने में एक लाख रूपए खर्च किए, उसकी एवज में उसको तीन माह में चार लाख रूपए की प्राप्ति हुई है। किसान के लिए यह पैदावार बेहद लाभदायी है। भविष्य में जाखड़ी सहित सुणतर क्षेत्र के काफी किसान इस फसल की तरफ आकर्षित हो रहे है। फसल की निकासी के बाद इसी जगह जायद का बाजरा बोने से किसान को अच्छी निकासी होती है।
Friday, 5 March 2010
करवाड़ा गांव में चारा डिपो नहीं खुलने से पशुपालक परेशान
इसके चलते पशुपालकों को चारे के लिए काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। प्रशासन द्वारा चारा डिपो खोलने के लिए प्रयास नहीं किए जा रहे हैं, जबकि करवाड़ा में ग्राम सेवा सहकारी समिति है। चारे के अभाव में पशुपालक मनमाने दाम पर चारा खरीदकर अपने पशुओं का बचाने में लगे हुए हैं। समय रहते चारे की व्यवस्था नहीं हुई तो पशुपालकों को अपने पशुओं को भगवान भरोसे छोडऩे को मजबूर होना पड़ेगा।
कुतर के भाव आसमान पर
चारे के अभाव में कुतर के भावों में दिनों-दिन बढ़ोतरी हो रही है जिसके चलते गांवों में रेत मिली कुतर के भाव प्रतिकिलों सात से आठ रूपया हो गया है। ऐसे में अब पशुपालकों के समक्ष अपने पशुओं को संभालना परेशानी भरा हो गया है। वे इन्हेंं छोडऩे को मजबूर हो रहे हैं।
-पशुपालक पिछले दो -तीन माह से चारे के लिए मारे -मारे घूम रहे हैं, लेकिन चारा नहीं मिल रहा है जिसके चलते चारे के लिए पशुपालकों का पलायन जारी है। वहीं चारे व पानी के अभाव में अब पशुधन को बचाना चुनौती बनी हुई है।
-रतनाराम जाट व केसाराम देवासी, पशुपालक, करवाड़ा
-चारे की समस्या के चलते पशुधन काल कलवित हो रहा है। अभी भी अगर चारे का डिपो खोला जाये तो पशुपालकों को चारे के लिए भटकना नहीं पड़ेगा।
-मानीदेवी,अध्यक्ष, जीएसएस, करवाड़ा
Sunday, 21 February 2010
कृषकों का भ्रमण २5 से
Sunday, 7 February 2010
अब महकेगी केसर क्यारी

गुमानसिंह राव. रानीवाड़ा
जलवायु और मौसम ने साथ दिया तो रानीवाड़ा क्षेत्र अब केसर की महक से महकेगा। एक प्रयोग के तहत उपखंड मुख्यालय से सिर्फ 20 किलोमीटर की दूरी पर प्रायोगिक तौर पर केसर की खेती की गई है। जिसके सफल होने की काफी संभावना है।
गांव में बसंत ऋ तु के आते ही खुशबूदार और कीमती जड़ी-बूटी 'केसरÓ की बहार आ रही है। वर्ष के अधिकतर समय ये खेत अन्य फसलों से लहलहातेे थे, लेकिन फरवरी के अंत तक ये खेत बैंगनी रंग के फूलों से सजने लग जाऐंगे। धानोल के केवाराम चौधरी व जाखड़ी के वनैसिंह देवड़ा ने धानोल में यह प्रयोग किया है। इन किसानों ने बताया कि गत वर्ष भी उन्होंने माउंट आबु के ब्रह्माकुमारी संस्थान से केसर के बीज लाकर लघु प्रयोग कर केसर की पैदावार तैयार की थी। इस बार कुछ ज्यादा मात्रा में केसर की क्यारिया तैयार की है। उन्होंने कहा कि कृषि विभाग का सहयोग नही मिलने के कारण इस कीमती फसल को प्रोत्साहन नहीं मिल रहा है। अनुकूल जलवायु के चलते इस फसल का प्रयोग काफी हद तक सफल रहा है। बकौल, केवाराम उन्होंने गत वर्ष तैयार केसर को शादी के समय दूध के साथ मिलाकर मेहमानों को सेवन कराया था। सुणतर के केसर का स्वाद भी स्वादिष्ट होने के कारण इस फसल के परिणाम भविष्य के लिए सकारात्मक आने की उम्मीद है।
इनका कहना
केसर का खेती करने वाले ने बताया कि गत वर्ष केसर कम तैयार हुआ था परंतु, फिर भी उम्मीद है कि इस बार बीते साल से उत्पादन ज्यादा होगा और दाम भी अच्छे मिलेंगे।
-केवाराम चौधरी, किसान, धानोल
इस प्रयोग के सफल होने पर विभाग इस खेती की ओर ध्यान देगा। अभी तो देख रहे है। वैसे जिले के कृषि अधिकारियों के लिए नया प्रयोग है। पौधे की ऊंचाई डेढ़ फीट है, फू ल आने पर ही मालूम पड़ेगा।
-कन्हैयालाल विश्नोई, सहायक कृषि अधिकारी, रानीवाड़ा
Thursday, 4 February 2010
आत्मा योजना के तहत कार्यशाला
कृषि विभाग की आत्मा योजना के तहत बुधवार को जाखड़ी में देवड़ा कृषि फार्म पर कार्यशाला का आयोजन किया गया। कार्यशाला के दौरान कृषि फार्म पर कृषि विभाग व कनाड़ा की मैकन्स कंपनी के सहयोग से तैयार की गई उत्तम किस्म की आलु की फसल का प्रदर्शन किया गया। कंपनी अधिकारियों के अनुसार यहां आलु की किस्म बाहर से मंगवाई गई है तथा प्रत्येक आलु का वजन आधा किलो से ज्यादा माना जाता है। कार्यशाला में कृषि विभाग के सहायक निदेशक बी.के. द्विवेदी, सहायक कृषि अधिकारी कन्हैयाला विश्नोई ने जल प्रबंधन, जैविक खेती व राज्य सरकार के द्वारा अनुदानित योजनाओं के बारे में विस्तार से जानकारी दी। पशुपालन विभाग के प्रवीणकुमार जोशी ने कृत्रिम गर्भाधान के बारे में बताया। कार्यशाला में सौ से ज्यादा किसानों ने भाग लिया।
Sunday, 31 January 2010
अफ्रीकन चिकोरी अब सुणतर में
दक्षिण अफ्रीका व ईजराईल में प्रचुर मात्रा में पैदा होने वाली प्रोटिनयुक्त चिकोरी औषधी सुणतर क्षेत्र के धामसीन गांव में पहुंच गई है। इस गांव में इस औषधीय पौधे की खेती की जा रही है और अगर यह सफल होती है तो यकीनन किसानों के लिए काफी फायदेमंद होगी। औषधी निर्माण के अलावा इस पौधे का उपयोग कॉफी पाउडर में भी किया जाता है। पालनपुर निवासी अरविंद पटेल ने धामसीन के भीमसिंह देवड़ा के कृषि फार्म पर प्रथम बार प्रयोग कर औषधीय खेती में क्रांतिकारी बदलाव लाए हैं।
क्या है चिकोरी : चिकोरी एक प्रकार का पौधा है। जिसकों जड़ों में प्रोटिन प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। कसैला स्वाद होने के कारण इस औषधि को काफी में मिक्स किया जाता है। पटेल के अनुसार इस पौधे की जड़ों को आयुर्वेदिक औषधि बनाने में किया जाता है। इसका बीज ईजराईल से मंगवाया जाता है। पौधा सूखने के बाद स्वादिष्ट होने से इसको दुधारू पशुओं को खिलाने पर दूध की मात्रा में इजाफा होता है।
अनुकूल है जलवायु
चिकोरी के लिए उष्णीय जलवायु अनुकूल मानी जाती है। जिसके लिए पश्चिमी राजस्थान अच्छा माना गया है। रानीवाड़ा क्षेत्र में अभी इसका प्रयोग किया जा रहा है अगर यह सफल होती है तो अन्य किसान भी इसे अपना सकेंगे। जिससे उन्हें अतिरिक्त आया हो सकेगी।
किसानों के लिए फायदेमंद
रा नीवाड़ा में इसे अभी प्रायोगिक तौर पर किया जा रहा है, लेकिन अगर यह सफल होती है तो इसका किसानों को फायदा होगा। खेती की सार संभाल कर रहे सोमाराम मेघवाल ने बताया कि चिकोरी की बुवाई सितम्बर में की जाती है तथा फरवरी में पौधा परिपक्व हो जाता है। जड़ों को थ्रेसर में छोटे-छोटे टुकड़ों में बदलने के बाद सुखाया जाता है। बाद में यह कॉफी में मिश्रण के लिए तैयार हो जाती है। उन्होंने बताया कि एक बीघा खेती में एक हजार रूपए का खर्चा होता है तथा इससे पन्द्रह हजार रूपए की आय अर्जित की जा सकती है। चिकोरी के हरे पौधे को पालतु व जंगली जानवर नष्ट नहीं करते हंै।
Thursday, 24 December 2009
जीरे पर ग्लोबल वार्मिंग का असर
सुणतर क्षेत्र में इस बार मानसून की रुसवाई व तापमान में आ रहे उतार चढ़ाव के कारण 25 प्रतिशत कृषि भूमि पर ही रबी की फसल बोई जा सकी। जानकारी के अनुसार इस बार ३२०० हैक्टेयर भूमि पर ही जीरे की फसल की बुवाई की गई है। जबकि गत वर्ष ४२०० हैक्टेयर भूमि पर बुवाई की गई थी।
क्षेत्र के खेतों में ग्लोबल वार्मिंग का प्रभाव देखने को मिल रहा है। तापमान में लगातार आ रहे उतार चढ़ाव के कारण फसलें अभी पूरी तरह से पक नहीं पा रही हंै। कृषि अधिकारियों का कहना है कि जब तक तापमान और अधिक नीचे नहीं आ जाता है तब तक फसलों को सुरक्षित रख पाना मुश्किल है। क्षेत्र के गांवों में अगर मौसम के तेवर यही रहे तो गेहूं, जौ, सरसों व जीरे की फसल को भारी नुकसान पहुंच सकता है। रबी की फसल नवंबर के अंत तक पूरे यौवन पर आ जाती है, लेकिन लगातार तापमान में आ रहे उतार-चढ़ाव के कारण खेतों में फसलें अभी भी पक नहीं पाई हैं। कृषि अधिकारियों का मानना है कि तापमान में जितनी गिरावट आएगी उतना ही फसलों को लाभ मिलेगा। इधर, जिले का अधिकांश किसान जीरे पर ही निर्भर है। ऐसे में उसकी आश भी जीरे को लेकर ही है। क्या है इस समय जीरे का हाल और क्या चल रहे हैं भाव। अभी और कैसे बचाया जा सकता है जीरे को पेश है एक रिपोर्ट।
ऊंझामंड़ी का रूझान
जीरे की अंतर्राष्ट्रीय ऊंझा मंडी के प्रसिद्ध एक्सपोर्टर बाबुभाई शाह के अनुसार भारत में इस समय अग्रिम स्टॉक करीब 7 लाख बोरियों का है। वर्तमान में बाजार बहुत उतार-चढ़ाव वाला है। कीमतें स्थिर नहीं हैं और कारोबारी पुराने स्टॉक पर मुनाफा वसूली में लगे हुए हैं। ऊंझा में बेहतरीन क्वालिटी के 20 किलोग्राम जीरे का मूल्य 2,100-2,150 रुपये पहुंच गया है, जबकि खराब क्वालिटी के जीरे की कीमत 1,800 से 1,850 रुपये है। ज्यादातर जीरा कारोबारियों का मानना है कि मध्य फरवरी के बाद ही स्थितियां और ज्यादा स्पष्ट हो पाएगी। जब नई फसल बाजार में आ जाएगी।
उन्नत किस्म
आर एस 1, एस 404, आर जेड 19, एम् सी 43, एम् यू सी, यू सी 198, एन पी डी 1, एन पी जे 126, सेलेक्शन 7-3, गुजरात जीरा 3 आदि।
जलवायु
जीरा ठंडे मौसम की फसल है, वानस्पतिक वृद्धि के लिए ठंडे मौसम परन्तु फूल आने और बीज पकने के समय उच्च तापमान और लम्बी प्रकाश अवधि वाले दिन उत्तम रहते हैं।
बीज की मात्रा
बीज का जीरा उत्पादन में विशेष महत्व है, इसकी अधिक उपज लेने के लिए बीज की पर्याप्त मात्रा बोनी चाहिए, आमतौर पर 20 किलो बीज प्रति हैक्टेयर पर्याप्त होता है।
जीरे के प्रमुख रोग एवं नियंत्रण
जीरे की फसल में मुख्यत: झुलसा रोग जिसमे पौधे की वृद्धि रुक जाती है और पौधा सूखने लगता है, अंगमारी जिसमे पौधा मुरझा जाता है, उसपर सफेद धब्बे आ जाते है और टहनियां नीचे की ओरे झुक जाती है, चूर्णी फफूंद जिसमे पौधे में सफेद चूर्ण सा लग जाता है प्रभावित करती हैं। इनकी रोकथाम के लिए 250 मिली लीटर नीम पानी, 25 मिली लीटर माइक्रो झिम प्रति पम्प मिलाकर अच्छी तरह से तर बतर कर छिड़काव करें इसके अलावा सुपर गोल्ड मैग्नीशियम 1 किलोग्राम प्रति एकड़ पानी में घोल कर छिडकाव करें। नीम पानी बनाने के लिए 25 किलो नीम की ताजी पत्तियों को 50 लीटर पानी में पकाए जब वह 20-25 लीटर रह जाए तब छानकर उपयोग करना चाहिए।
किसान अपनाएं फव्वारा पद्धति
ञ्चतापमान में गिरावट आती है तो ही फसल को फायदा होगा। अगर ठंड में कमी आती है तो रबी की फसल में कीड़े लगने की संभावना बढ़ जाती है। किसानों को फव्वारा पद्घति से सिंचाई कर अपनी फसल को सुरक्षित रखना चाहिए।
कन्हैयालाल विश्नोई,
सहायक कृषि अधिकारी, रानीवाड़ा
ञ्चक्षेत्र में पानी की कमी के कारण इस बार रबी की फसल किसानों द्वारा कम बोई गई है। तापमान में आ रहा उतार चढ़ाव फसल को नुकसान पहुंचा सकता है। प्रयास कर फसल को बचाने में लगे है। अभी तक फसल पूरे यौवन पर नहीं आई है।
बाबूलाल चौधरी,
किसान, कोट की ढ़ाणी
Sunday, 20 December 2009
ताईवानी पपीते का स्वाद सुणतर में
सुणतर क्षेत्र की अनुकूल जलवायु के चलते ताईवान देश के पपीतों की यहां के खेतों में अच्छी पैदावार हो रही हंै। कृषि विभाग व जागरूक किसानों ने मिलकर यह अजूबा यहां कई गांवों में कर दिखाया है। पपीते की परंपरागत खेती के बनिस्पत ताईवानी खेती किसानों के लिए लाभप्रद देखी जा रही है। धानोल निवासी रमेशकुमार चौधरी ने तीन वर्ष पहले परंपरागत खेती में हटकर नई तकनीक के कई प्रयोगों की शुरूआत की थी। अभी निकटवर्ती भाटवास में चौधरी ने सैकड़ों बीघा जमीन में यह प्रयोग कृषि विभाग के सहयोग से किया है। जो शतï-प्रतिशत सफल रहा है।
किसानों के लिए वरदान : सहायक कृषि अधिकारी कन्हैयालाल विश्नोई ने बताया कि यह किस्म रानीवाड़ा क्षेत्र किसानों के लिए वरदान साबित हो रही है। एक हैक्टेयर में किसान इस फसल से चार लाख रुपए की नकद कमाई कर रहे हंै। क्षेत्र के किसान जुलाई माह में गुजरात की नर्सरियों से दस रुपए प्रति पौधे के हिसाब से खरीद कर खेतों में बुवाई करते हैं, जबकि देशी पपीते को किसान खुद ही बीज द्वारा तैयार करते हैं। इस फसल को ड्रीप ईरिगेशन सिस्टम द्वारा सिंचित किया जाता है। जिससे पानी की अच्छी बचत हो रही है।
देसी व ताईवानी किस्म की तुलना
दे शी पपीते का स्वाद फीका या कम मीठा होता है, वहीं ताईवानी पपीता स्वादिष्ट व काफी मीठा होता है। जहां देशी पपीते के दो या तीन दिन में खराब होने की संभावना रहती है, वहीं विलायती किस्म आठ से दस दिन तक खराब नहीं होती है। इस खासियत के चलते किसान पपीते को दिल्ली, मुंबई सहित देश के अन्य भागों में भी भेज रहे हैं। देशी पपीते के पेड़ पर ४०-५० किलो फल लगते हैं वहीं ताईवानी पेड़ पर ७०-८० किलो फल प्राप्त होते हंै।
Wednesday, 16 December 2009
किसान संघ की बैठक संपन्न
भारतीय किसान संघ उपशाखा रानीवाड़ा की बैठक कस्बे के आपेश्वर महादेव मंदिर में विभाग महामंत्री सोमाराम चौधरी की देख-रेख में हुई। बैठक में कार्यकारिणी का सर्वसम्मति से पुनगर्ठन कर चेणीदान चारण को उपशाखा के अध्यक्ष पद पर चुना गया। महामंत्री के रूप में मालमसिंह पूरण को बनाया गया। नवनियुक्त अध्यक्ष को शीघ्र ही कार्यकारिणी के गठन करने के निर्देश दिए गए। बैठक में अकाल के दौरान किसानों को फसली बीमा दिलाने के लिए चर्चा की गई तथा इस कार्य को लेकर आंदोलन शुरू करने की रूप रेखा बनाई गई। किसानों ने विद्युत कृषि कनेक्शन से मीटर प्रणाली के तहत फ्लेट रेट से तीन गुना ज्यादा बिल आने पर चिंता व्यक्त कर मीटर प्रणाली का विरोध करने का निर्णय लिया गया
Tuesday, 15 December 2009
महिलाओं को सशक्त बनाने का कदम : चौधरी
पंचायत समिति मुख्यालय पर साक्षरता विभाग द्वारा व्यावसायिक शिविरों में तैयार सामग्री की प्रदर्शनी व स्टॉल का शुभारंभ रविवार शाम को मुख्य अतिथि राजस्व मंत्री हेमाराम चौधरी ने फीता काटकर किया। चौधरी ने प्रदर्शनी का अवलोकन किया तथा प्रसन्नता जाहिर की। इस दौरान उन्होंने कहा कि इस प्रकार के शिविरों के माध्यम से महिलाओं को सशक्त बनाया जा सकता है। समारोह के अध्यक्ष विधायक रतन देवासी ने कहा कि क्षेत्र में महिलाएं आखरज्ञान लेने के साथ साथ स्वयं सहायता समूहों से जुड़ें तथा स्वयं छोटी छोटी बचत कर योजना का लाभ उठावें। विशिष्ट अतिथि जिला प्रमुख मंजू मेघवाल ने कहा कि अब महिलाओं को साक्षर होकर पंचायती राज को मजबूत बनाने के लिए आगे आना होगा। भीनमाल के पूर्व विधायक डॉ. समरजीतसिंह ने महिलाओं के लिए इस प्रकार के आयोजनों को सार्थक प्रयास बताया। जिला कलेक्टर के.के. गुप्ता ने प्रदर्शनी व स्टॉल की जानकारी ली। साक्षरता खंड समन्वयक ताराचंद भारद्वाज एवं साक्षरता सहायक चमनाराम देवासी ने साक्षारता विभाग के कार्यों की जानकारी दी। इस अवसर पर सांचौर पूर्वप्रधान सुखराम विश्नोई, भीनमाल नगर पालिकाध्यक्ष हीरालाल बोहरा, उप कलेक्टर कैलाशचंद्र शर्मा, विकास अधिकारी ओमप्रकाश शर्मा, सांचौर पंचायत समिति प्रशासक सतीश प्रकाश कट्टा, जिला परिषद सदस्य रवाराम देवासी, पंचायत समिति सदस्य जीवाराम, आसुराम, पूनमाराम, पीराराम, परसराम ढाका, गणेश एडवोकेट, ईश्वर मेहता, पारसमल जीनगर, उपप्रधान प्रेमाराम चौधरी, अंबालाल चितारा, सरपंच तगाराम, कृष्ण कुमार रोड़ा, डॉ. आलाराम चौहान, सहायक अभियंता अमृतलाल वर्मा, जलदाय आरएम यादव, जेठाराम वर्मा, रमेश शर्मा, वरधाराम परमार, नारणाराम, ग्राम सेवक भाणाराम बोहरा, प्रेरक पुरूषोत्तम, नव साक्षरता मंजु, गीता व अल्का समेत काफी संख्या में लोग मौजूद थे।