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रतनपुर में गाय पर हमला करने वाले युवक गिरफ्तार, रानीवाडा उपखंड की ताजा खबरों के आपका स्वागत।।
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Wednesday, 29 June 2011

जालेराकलां में बनेगी नई मंडी

किसानों को नहीं जाना पड़ेगा गुजरात, चार दीवारी एवं चैक पोस्ट निर्माण के लिए 53 लाख रुपए की स्वीकृति 
रानीवाड़ा 
जिला प्रशासन ने रानीवाड़ा में स्वतंत्र कृषि उपज मंडी की कवायद शुरू कर दी है। तहसीलदार ने कृषि मंडी के लिए जालेरा कलां में भूमि का चयन कर ग्राम पंचायत को राशि का भुगतान भी कर दिया है। चार दीवारी एवं चैक पोस्ट निर्माण के लिए 53 लाख रुपए की स्वीकृति भी मिल गई है। इस मंडी का फायदा किसानों को होगा। अब वे गुजरात की बजाय इस मंडी में अपने जींस की बिक्री कर ज्यादा लाभ अर्जित कर सकेंगे।
जानकारी के मुताबिक, जिले में रानीवाड़ा तहसील में प्रचुर मात्रा में भू-जल संपदा होने से यहां पर एक साल में तीन फसलें किसान लिया करते हैं। जिले में कृषि विपणन व्यवस्था सुव्यवस्थित नहीं होने के कारण अधिकतर किसान अपनी फसल को गुजरात की मंडियों में बिक्री के लिए ले जाते हैं। गत विधानसभा चुनावों में वर्तमान विधायक रतन देवासी ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में रानीवाड़ा की गौण मंडी को भीनमाल मंडी से अलग कर संपूर्ण मंडी का दर्जा देने का वादा किया था। जिसके बाद यह कवायद की जा रही है।
संपूर्ण मंडी होगी जालेरा में 
वर्तमान में रानीवाड़ा उपखंड पर गौण मंडी संचालित की जा रही है, परंतु पर्याप्त मात्रा में किसानों एवं व्यापारियों के लिए सुविधाएं नहीं होने के कारण मंडी को अपेक्षित लक्ष्य की प्राप्ति नहीं हो रही है, जबकि जिले की सर्वाधिक पैदावार रानीवाड़ा क्षेत्र में ही होती है। विधायक के प्रयासों से उपखंड प्रशासन ने संपूर्ण मंडी के लिए कस्बे से तीन किलोमीटर दूर सांचौर सड़क मार्ग पर जालेरा कलां गांव में 4.84 हैक्टेयर जमीन का चयन किया। इस जमीन को डी.एल.सी. की दर पर भीनमाल मंडी ने खरीद कर 8.14 लाख रुपए का भुगतान भी कर दिया गया है। भीनमाल मंडी के सचिव हरी राम जोशी ने गत 21 जून को तहसीलदार खेताराम राणा एवं ग्राम पंचायत के सरपंच रेवाराम भील से बाकायदा कब्जा भी ले लिया है। अब इस जमीन की एक दो दिनों में सफाई शुरू हो जाएगी। इसके बाद यहां चार दीवारी का कार्य करवाया जाएगा। बाद में सुव्यवस्थित एवं सुनियोजित ढंग से आधुनिक मार्केट यार्ड, चैक पोस्ट, कार्यालय, पेयजल व्यवस्था के लिए उच्च जलाशय, किसान भवन एवं गोदाम का निर्माण किया जाएगा।
जरूरत है कोल्ड स्टोरेज की 
रानीवाड़ा क्षेत्र में बड़े पैमाने पर आलू, प्याज और टमाटर सहित कई प्रकार की सब्जियों की पैदावार होती है, परंतु स्टोरेज की व्यवस्था नहीं होने के कारण किसान कम मूल्य में अपनी पैदावार बेच देते हैं। रानीवाड़ा से 70 किलोमीटर दूर गुजरात के डीसा शहर में 50 से ज्यादा कोल्ड स्टोरेज बने हुए हैं। उसी की तर्ज पर रानीवाड़ा क्षेत्र में भी कृषि मंडी परिसर में कोल्ड स्टोरेज की जरूरत है, ताकि किसान टमाटर पर आलू लंबे समय तक कोल्ड स्टोरेज में रखकर ज्यादा मुनाफा कमा सके।

Thursday, 30 December 2010

नहर पर पुल बनाने की मांग

रानीवाड़ा
वणधर के किसानों ने कलेक्टर को पत्र प्रेषित कर बांध से निकलने वाली मुख्य नहर पर पुलिया बनाने की मांग रखी है। पंचायत समिति सदस्य उगमदेवी मेघवाल ने बताया कि वणधर बांध के सामने मुख्य नहर पर पुल नहीं होने के कारण रोपसी गांव जाने वाले लोगों को आवागमन में भारी परेशानी झेलनी पड़ती है। 

लिहाजा किसानों को लंबा रास्ता तय कर रोपसी जाना पड़ रहा है। उन्होंने बताया कि नहर पर पुल निर्माण का कार्य सिंचाई विभाग द्वारा स्वीकृत होने के बाद विभागीय अधिकारियों के लापरवाही के चलते कार्य नहीं करवाया जा रहा है। उन्होंनें बताया कि वणधर बांध में पानी की अच्छी आवक होने से आस-पास के कृषि कुओं का जलस्तर बढ़ा है। जलस्तर को बढ़ाने को लेकर बांध का पानी नहरों या नदी में नहीं छोड़ा गया है। किसानों ने मांग की है कि बांध के पेटा कास्त भूमि में आए हुए किसानों को मशीन लगाकर पानी का दोहन करने की स्वीकृति दिलावे, ताकि किसान कम लागत से अच्छी फसल तैयार कर सके। उन्होंने कहा कि बांध में इन दिनों कुछ मशीनों द्वारा किसान पानी का दोहन कर फसल तैयार कर रहे हंै।

Tuesday, 12 October 2010

एलोवेरा की खेती से मिल रहा लाभ

रानीवाड़ा
आयुर्वेद चिकित्सा सहित सौन्दर्य प्रसाधन सामग्री के बढ़ते उपयोग से आर्थिक लाभ कमाने की दृष्टि से सुणतर में भी अब एलोवेरा की फसल लहलहाने लगी है। 

रानीवाड़ा कस्बे के कृषक प्रेमाराम चौधरी के अनुसार जोधपुर व बीकानेर से एलोवेरा के 50 हजार रोप लाकर करीब 35 बीघा में इसकी खेती की है। वर्तमान में पौधे लहलहाने लगे हैं। चौधरी के अनुसार एलोवेरा की फसल को पानी की जरूरत कम होती है।

इसी तरह गोधाम पथमेड़ा द्वारा संचालित केसुआ गो मंडल में भी ३०० बीघा भूमि पर एलोवेरा की खेती की जा रही है। बाजार में बढ़ती मांग को देखते हुए क्षेत्र के इस खेती को अपनाने लगे हैं। एक पौधे से करीब 8 से 10 किलो तक एलोवेरा प्राप्त होती है। इसकी पत्तियां काटकर बेची जाती है। रास आने लगी आबो हवा घृत कुमारी और ग्वारपाठे के नाम से ख्यात एलोवेरा मूलत: मरू प्रदेश की उपज है। 

कम पानी तथा भौगोलिक परिस्थितियों के कारण यह रेतीले भागों में बहुतायत से पाया जाता है। बदलते मौसम चक्र के कारण इसे अब सुणतर की आबोहवा रास आ रही है। किसान इसकी खेती करके अच्छा लाभ कमा सकते है। घृतकुमारी की फसल से किसान प्रति हेक्टेयर 65 से 70 हजार रुपये बचत कर सकते हैं। इसकी खेती अनुपजाऊ भूमि में भी की जा सकती है।

क्या है खूबी

घृतकुमारी का वैज्ञानिक नाम एलोबार्बाडेसिस है। भारतीय चिकित्सा पद्धतियों आयुर्वेद और यूनानी में घृतकुमारी नाम से प्रयुक्त होने वाला यह प्रमुख एवं विशिष्ट महत्व का औषधिय द्रव्य है। इसका उपयोग विभिन्न औषधीय एवं प्रसाधन सामग्रियों के निर्माण में किया जाता है। औषधिय और सौन्दर्य प्रसाधन निर्माण में इसकी मांग काफी बढ़ी है। इसकी फसल की खूबी यह है कि इसे कैसी भी भूमि में लगाया जा सकता है। इसकी फसल को सिंचाई की कम आवश्यकता होती है। फसल 10-12 महीने में तैयार हो जाती है। लागत को निकालकर किसान 70 हजार प्रति हेक्टेयर शुद्ध आय प्राप्त कर सकते हैं।

Tuesday, 21 September 2010

रबी अभियान शुरू, शिवर में योजनाओं की जानकारी दी

रानीवाड़ा

कृषि विभाग की ओर से ग्राम पंचायत चितरोड़ी व रोपसी में सोमवार को रबी अभियान का शुभारंभ सरपंच कमलदेवी मेघवाल व कालूराम मेघवाल की देख रेख में किया गया। इस मौके सहायक कृषि अधिकारी कन्हैयालाल विश्रोई ने कृषि विभाग व उद्यान विभाग की विभिन्न अनुदान योजनाओं के बारे में जानकारी दी। उन्होंने कृषि यंत्र थ्रेसर, शीड फर्टीलाइजर ड्रिल व जल होद के अनुदान के बारे में बताया। उद्यान विभाग की फव्वारा, बूंद-बूंद व माइक्रो फव्वारा योजना के तहत दिए जाने वाले अनुदान के बारे में जानकारी देते हुए रबी सीजन की विभिन्न फसलों की कृषि विधियों के बारे में किसानों को बताया। बाद में दोनों पंचायतों में महिला कृषकों को ३०-३० राई के मिनी किट निशुल्क उपलब्ध करवाए गए। मंगलवार को वणधर व चाटवाड़ा में शिविर आयोजित किए जाएंगे।


Sunday, 22 August 2010

खरपतवार के खिलाफ मित्र बैल


रानीवाड़ा
क्षेत्र में खरीफ की फसल में खरपतवारों की रोकथाम को लेकर किसानों ने परम्परागत तरीके अपनाने शुरू कर दिए है। इस वर्ष अच्छी बरसात होने से किसानों के खेत सोना उगल रहे है, परंतु फसल में खरपतवार की अधिकता के चलते भूमि में पोषक तत्वों की कमी होने की संभावना जताई जा रही है। इन दिनों गांव-गांव ढाणी-ढाणीं में किसान अपने खेतों में खरपतवार की रोकथाम के कई तरीके प्रयोग में लेते दिखाई दे रहे हंै। 
जानकारी के मुताबिक, फसलों के पौधे अपनी प्रारंभिक अवस्था में खरपतवारों से मुकाबला नही कर पाते हैं। किसान खरपतवारों को तब तक बढऩे देते ह़ै जब तक की वह हाथ से पकड़कर उखाडऩे योग्य नहीं हो जाए, लेकिन उस समय तक खतपतवार फसलों को काफी नुकसान कर चुकी होती है। ऐसे में किसान इस खरपतवार को निकालने के लिए कई पारंपरिक और रोचक तरीके अपनाते हैं। इनमें से ही एक है बैलों की मदद से इसे निकालना।खेतों में खड़ी फसल को बैल नुकसान नही पहुंचाए व सीधी लाईन में चाल बनी रहे। उसके लिए किसान बैलों के मुंह पर खरणीया या खीपड़ा का पौधा बांध देते है, जिससे बैल सही दिशा में सही समय पर चलता रहता है। वह किसान के दिए गए निर्देशों की पालना करता है। यह तरीका परम्परागत रूप से कई वर्षों से क्षेत्र में प्रचलित है।

क्या है तरीके : किसान फसलों में खरपतवार की रोकथाम को लेकर कई तरीके अपनाते है। जिसमें मुख्यत: हाथ से निराई गुड़ाई है। इस तरीके के तहत बुवाई के 15 से ४५ दिनों के मध्य खुरपी से खरपतवार को निकाला जाता है। बैलों द्वारा गहरी जुताई करने से भी खरपतवार पर रोकथाम लगती है। हाथ से चलने वाले गुड़ाई यंत्र से भी खरपतवार को काफी सीमा तक नियंत्रित किया जा सकता है। इसके अलावा रसायनों के प्रयोग से भी खरपतवार को समाप्त किया जा सकता है।

इनका कहना

खरपतवार की रोकथाम में परम्परागत तरीके किसानों के लिए अभी भी लाभदायी है। थोड़ी मेहनत की जरूरत पड़ती है, परंतु परिणाम किसान के पक्ष में रहता है।

- गोदाराम देवासी, किसान एवं सरपंच, रानीवाड़ा

खरपतवार की रोकथाम को लेकर किसानों को समय-समय पर विभाग द्वारा जानकारी दी जाती है। इस बार भी किसानों को पर्याप्त मात्रा में खरपतवार की रोकथाम को लेकर रसायनिक दवाओं की जानकारी दे दी गई है। 

-कन्हैयालाल विश्रोई, सहायक कृषि अधिकारी, रानीवाड़ा

हाड़ेचा. कस्बे सहित आस-पास के इलाकों में इस बार अच्छी बारिश के बाद किसानों ने बंपर बुवाई की है। खरीफ की अच्छी फसल होने के कारण किसानों ने अपनी अलग-अलग तकनीकों द्वारा खेतो में खरपतवार शुरू कर दी है। इसको लेकर किसान अपने खेतो में बैल, ऊंट एवं टै्रक्टरों से बाजरे की फसल में खरपतवार करने में जुट गए हैं।

नुकसान

कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार खरपतवार से 25 से 70 प्रतिशत तक उत्पादन घट सकता है। इनके द्वारा भूमि की उर्वरा शक्ति को प्रभावित किया जाता है। भूमि में उर्वरक, नाईट्रोजन, फास्फोरस तथा पोटाश की मात्रा घटने से फसलें प्रभावित होती हैं। इन दिनों खेतों में निराई गुडाई का काम भी जोरो पर हंै। किसान द्वारा सही समय पर खरपतवार नही निकालने पर काफी नुकसान होने की संभावना होती है।

Wednesday, 11 August 2010

सिंचाई विभाग ने चेकला बांध का तकमीना बनाया

रानीवाड़ा
गत सप्ताह विधानसभा क्षेत्र के चेकला बांध का अतिवृष्ट्रि से हुए नुकसान का आंकलन लेने के लिए आज विधायक रतन देवासी के साथ सिंचाई विभाग के सहायक अभियंता सहित वन विभाग के जिला उपवन सरंक्षक मौके पर पहुंचे। निरीक्षण की टीम ने बांध के चारों तरफ अवलोकन कर बांध को पूर्णतया मरम्मत कर पानी के सरंक्षण को लेकर तकमीना बनाया। सिंचाई विभाग के सहायक अभियंता मेघराज ने बताया कि चेकला बांध की मरम्मत को लेकर ४.७७ लाख का तकमीना बनाकर विभाग के अधिशाषी अभीयंता जालोर को भेज दिया गया है। जिला कलेक्टर इस कार्य को स्वीकृत कर अतिशीघ्र कार्य शुरू करने का आदेश देंगे। अधिशाषी अभियंता राजकुमार चौधरी ने बताया कि चेकला बांध के मरम्मत का कार्य को लेकर बनाया गया तकमीना जिला कलेक्टर को प्रेषित कर दिया गया है। अतिशीघ्र स्वीकृति मिलने पर कार्य शुरू किया जाएगा।
गौरतलब यह है कि इस बांध के क्षतिग्रस्त होने से आस-पास के दर्जनों गांवों के किसान रबी की फसल से वंचित रहेंगे। बांध में पानी के भण्ड़ारण ने कृषि कुंए पानी से लबालब भरे रहते है। अब ऐसी स्थिति नही रहने से किसान चिंतित नजर आ रहे है।
इस अवसर पर निरीक्षण के दौरान प्रधान दीपाराम भील, उपप्रधान दरगाराम देवासी, सहायक अभियंता रमेश शर्मा, डीएफओ आर.एन. मीणा सहित कई जनप्रतिनिधि उपस्थित थे।

Friday, 16 July 2010

किसानसंघ ने दिया ज्ञापन

रानीवाड़ा(16.07.2010)
क्षेत्र के किसानों की कई समस्याओं को लेकर गुरुवार को भारतीय किसान संघ ने मुख्यमंत्री के नाम ज्ञापन एसडीएम को सौंपा। विभागाध्यक्ष सोमाराम चौधरी ने बताया कि नए कृषि कनेक्शन में विभाग के द्वारा फव्वारा सेट व ३ स्टार विद्युत मोटर की खरीद अनिवार्य करने से किसानों पर आर्थिक भार बढ़ गया है। उन्होंने कहा कि बूंद-बंूद सिंचाई की पद्धति नरम कृषि भूमि में ही संभव है। रानीवाड़ा तहसील के अधिकांश खेतों में काली कठोर मिट्टी होने की वजह से यह सिस्टम सफल नहीं हो पाएगा। चौधरी ने नए बिजली कनेक्शनों में सरलीकरण करने का निवेदन किया है।

तहसील अध्यक्ष सेणीदान चारण ने बताया कि क्षेत्र में मौसम की अच्छी बरसात होने की वजह से किसानों ने बाजार से हाईब्रिड बाजरा खरीदकर बुवाई की है, लेकिन किसानों को नकली बीज दिए गए हैं। खेतों में बाजरे की फसल जमीन से बाहर भी नहीं आई है। ऐसे आरोपी बीज विक्रताओं के विरूद्ध कड़ी कार्रवाई करने का निवेदन किया है। इस अवसर पर काफी तादाद में संघ के सदस्य व किसान उपस्थित थे।

Monday, 12 July 2010

ग्रह नक्षत्रों से भी किसानों को आस

रानीवाड़ा(12.07.2010)
क्षेत्र में अब तक अच्छी बरसात से किसानों में खुशी और अच्छी फसल की उम्मीद है। हालांकि बरसात का दौर पिछले सप्ताह भर से थमा हुआ है, लेकिन बुजुर्ग लोग अब यहां चलने वाली हवाओं और ग्रह नक्षत्रों के आधार पर भी अच्छे जमाने की आस लगाए बैठे हैं। इन बुजुर्ग लोगों की मानें तो हवाओं का रुख और नक्षत्रों की स्थिति से भी फसल पर काफी प्रभाव पड़ता है। जो हवाएं अभी चल रही हैं वे क्षेत्र में बोई गई बाजरे की फसल के लिए अच्छी मानी जा रही हैं। वहीं नक्षत्रों की स्थिति से भी अच्छा प्रभाव होने वाला है। मानसून के प्रथम चरण में ही रानीवाड़ा क्षेत्र में १६० मिमी बरसात होने से लोगों ने चार दिन से बाजरा की बुवाई शुरू कर दी है। ऐसा मानना है कि आद्रा नक्षत्र में बाजरा की बुवाई करने से बाजरा अच्छी तादात में तैयार होता है। अब पुनर्वसु नक्षत्र शुरू हो गया है। इस नक्षत्र में भी बरसात होना अच्छा माना जाता है। इसी प्रकार अगर अश्लेषा नक्षत्र में बरसात होती है तो वह फसलों के लिए सही नहीं होती।

किसानों को चाहिए थोड़ी देरी से बरसात

खेतों में बीज बो चुके किसानों को अभी बरसात नहीं चाहिए। इन किसानों को मानना है कि अगर अभी बरसात होती है तो इससे नुकसान होगा। किसानों ने बताया कि २० जुलाई से ३ अगस्त के बीच बरसात होने पर बाजरे की फसल सोलह आना होने की संभावना है। ३ अगस्त के बाद अश्लेषा नक्षत्र शुरू होगा, जिसमें बरसात वर्जित मानी जाती है। ऐसा माना जाता है कि अश्लेषा में बरसात का पानी खारा होता है। जो फसलों के लिए सही नहीं है।

हवाओं का भी असर

इधर क्षेत्र में इस समय हवाएं चल रही हैं। इन हवाओं को लेकर भी किसानों की अलग-अलग राय है। कुछ लोग फसलों के लिए ऊनालु हवा अच्छी मानते हंै। ऐसी हवाओं से बाजरे का दाना जमीन में जल्दी अंकुरित होकर बाहर आ जाता है। सियालु हवा चलने पर बाजरा अंकुरित नही हो पाता है। यदि इसी तरह का मौसम चलता रहे तो जमाना अच्छा होने की संभावना है। बाजरे की बुवाई के बाद अब किसान कठोळ यानि मूंग, मोठ, ज्वार, चवला, ग्वार की बुवाई कर रहे हंै। पुनर्वसु नक्षत्र में कठोळ फसल की बुवाई से अच्छे परिणाम आना माना जाता है। वैसे क्षेत्र के खेतों में बाजरा खेतों में उगने लग गया है।

इनका कहना है

-मौसम फिलहाल किसानों के अनुकूल है। अभी तक अच्छी बरसात से हमें राहत मिली है। अब अगर थोड़े समय बाद बरसात होती है तो अच्छी फसल होगी।

- गोदाराम देवासी, 
सरपंच ग्राम पंचायत रानीवाड़ा

-अभी ऊनालु हवा चल रही है। जो किसानों व फसलों के लिए अच्छी है। बरसात के बाद हमने बुवाई की और अब खेतों में बाजरे के पौधे जल्दी उगने लग गए हैं।

- गलबाराम मेघवाल, 
किसान, मेड़ा किसान 


-खरीफ की तैयारी में लग गए हैं। मौसम उनके अनुकूल है। किसानों को आशा है कि इसके बाद अच्छी फसल होगी।

- कन्हैयालाल विश्नोई, 
सहायक कृषि अधिकारी रानीवाड़ा

Sunday, 11 July 2010

बारिश के बाद खेतों में चले हल

रानीवाड़ा
उपखंड में बारिश के साथ ही बुवाई का दौर आरम्भ हो चुका है। पिछले दो दिन में क्षेत्र में हजारों हेक्टेयर में बुवाई हुई है। मरुधरा के लिए पिछले तीन दिन खुशी का पैगाम लेकर आए। इस दौरान सुणतर, परगना, देवल पट्टी व काबा पट्टी बेल्ट में अच्छी बारिश हुई। ऐसे में पिछले साल अकाल की पीड़ा सह चुके किसानों के चेहरों पर भी खुशियां छा गईं।

खेतों की रौनक लौटी 

खेतों की रोनक भी बारिश के चलते लौट आई है। कल तक जो खेत सूने-सूने थे वहां अब हल चल रहे हैं तो किसानों के परिवार भी पहुंचने लगे हैं। कई गांवों में सूनी पड़ी ढाणियों में भी जीवन लौट आया है। अब तक लक्ष्य के मुकाबले क्षेत्र में कम बुवाई हुई है, लेकिन बारिश के बाद लक्ष्य पूरा होने की उम्मीद बंधी है। क्षेत्र में बाजरा, मूंग, ग्वार, मोठ, अरण्डी, तिल, ज्वार, मुंगफली की बुवाई की गई है। सहायक कृषि अधिकारी कन्हैयालाल विश्नोई ने बताया कि बारिश का दौरा शुरू होनेे से क्षेत्र में लक्ष्य पूरा होने की उम्मीद है। पिछले दो-तीन दिन से बुवाई में तेजी आई है।

Thursday, 24 June 2010

निशुल्क मिनी किट बांटे

रानीवाड़ा! आगामी खरीफ की बुवाई को लेकर राज्य सरकार ने लघु सीमांत कृषकों के लिए बाजरा बीज के निशुल्क मिनी किट उपलब्ध करवाए हंै। बुधवार को कस्बे की ग्रामसेवा सहकारी समिति के माध्यम से सरकारी मिनी किटों का वितरण शुरू किया गया। व्यवस्थापक मानसिंह काबा ने बताया कि कस्बे के किसानों के लिए 1015 मिनी किट आवंटित हुए हैं। जिन किसानों को सरकारी अनुदान दिया गया था। उनकों बाजरा के बीज निशुल्क प्रदान किए जाएंगे। इस अवसर पर रानीवाड़ा कलां के सरपंच गोदाराम देवासी, रानीवाड़ा खुर्द के सरपंच करमीराम भील, सहायक कृषि अधिकारी कन्हैयालाल विश्रोई, सहायक व्यवस्थापक जोराराम परमार भी मौजूद थे।

Sunday, 6 June 2010

अतिक्रमण की चपेट में सुकल नदी

रानीवाड़ा

किसी समय अच्छी बारिश और जलस्रोतों में पर्याप्त पानी होने से क्षेत्र कभी बहुफसली इलाके के रूप में विख्यात मारवाड़ का कश्मीर सुणतर क्षेत्र अब सूखे का दंश झेल रहा है। सूखे के हालात और औसत से कम बारिश के चलते यहां बहने वाली बारहमासी सुकल नदी तट के आसपास का क्षेत्र फसल तो दूर बूंद-बूंद पानी के लिए तरस रहा है। क्षेत्र के लगभग सभी गांव लघु नदियों के किनारे बसे हुए हैं। पूर्व में सामान्य बरसात होने से हर वर्ष नदी में पानी की आवक रहने से आसपास के किनारों पर आबाद सैकड़ों की संख्या में कृषि कुएं पानी से लबालब रहते थे। खरीफ की फसल लेने के बाद यहां पर जीरा, रायड़ा, गेहूं, इसबगोल आदि भरपूर फसलें होती थीं। अब कुएं सूख जाने एवं प्रकृति में बदलाव आने से बहुफसली तो दूर एक फसल भी किसानों को नसीब नहीं हो रही है।

सुकल बचाओ

सुकल नदी से क्षेत्र के लगभग सभी गांवों में ग्रामीणों को पर्याप्त मात्रा में पेयजल उपलब्ध होता था। नदी में पानी नहीं आने से कुएं सूख गए। अब यहां के किसान सुकल नदी में पानी का प्रवाह बरकरार रखने के लिए लामबद्ध होने लगे है। नदी में सैकड़ों बीघा भूमि पर प्रभावशाली लोगों ने कथित पेटा कास्त आवंटन के नाम पर अवैध कब्जा कर रखा है, जिससे नदी में जल का प्रवाह रुक गया है। दर्जनों गांवों के लोगों के हलक भी इसी नदी के पानी से तर हो रहे हंै। नदी किनारे भाटवास गांव से पाइपलाइन से रानीवाड़ा में पेयजल मुहैया कराया जा रहा है। ऐसे में नदी को संरक्षित नहीं किया गया तो भविष्य में लोगों को काफी ज्यादा परेशानी का सामना करना पड़ेगा।

नदी को समय रहते अतिक्रमण से बचाया नहीं गया तो ऐतिहासिक सुकल नदी लुप्त हो जाएगी। सरकार को इस मामले को गंभीरता लेते हुए कार्रवाई करनी होगी।

- कृष्णकुमार पुरोहित, किसान, रोड़ा

क्षेत्र की जीवन रेखा सुकल नदी ही है। इस नदी के कारण ही क्षेत्र में थोड़ी बहुत हरियाली बची है। सरकार इस नदी को संरक्षित कर जल प्रवाह को बचाने के लिए उपाय करे तो नदी एक बार फिर पुराने स्वरूप में आ सकती है।

- बाबूलाल चौधरी, सरपंच ग्राम पंचायत, बडग़ांव

कम बारिश के चलते क्षेत्र की एक मात्र बारहमासी सुकल नदी का अस्तित्व भी अब खतरे में है। कभी कल कल कर बहने वाली यह नदी निरंतर अपना वजूद खोती जा रही है। जगह-जगह बांध बनने से पानी की आवक बंद हो गई, वहीं बड़ी तादात में कृषि कुंए खुद जाने व पानी का अत्यधिक दोहन होने से भू-जल स्तर भी रसातल पहुंच गया है।

Tuesday, 1 June 2010

शिविर सम्पन्न


रानीवाड़ा

खरीफ अभियान 2010 के तहत सोमवार को कृषि व आदान शिविर का जालेरा खुर्द में आयोजन किया गया। कार्यक्रम में सरपंच रेवाराम भील और पंचायत समिति सदस्य वागाराम देवासी ने राज्य सरकार की योजनाओं के बारे में लोगों को जानकारी दी। सहायक कृषि अधिकारी कन्हैयालाल विश्नोई ने फसलों में उत्पादन वृद्धि के मूल-मंत्र, जैविक खेती, बागवानी खेती, जल सरंक्षण, उन्नतकृषि उपकरण, मौसम आधारित बीमा, बायो फर्टिलाइजर आदि के बारे में किसानों को बताया। कृषि पर्यवेक्षक खीयाराम ने मृदा स्वास्थ्य कार्ड, मिट्टी के नमूने लेने की विधि व उससे होने वाले फायदे के बारे में जानकारी दी। शिविर में महिला कृषकों को निशुल्क बीज, मिनी किट व पशुपालन विभाग द्वारा मिनरल मिक्सर के पैकेट प्रदान किए। एक जून को जाखडी व दो जून को जोडवास में शिविर का आयोजन किया जाएगा।

Sunday, 23 May 2010

पपीतों से कमाए बीस लाख



रानीवाड़ा
सुणतर क्षेत्र के एक युवा किसान ने दो हैक्टेयर जमीन में विदेशी पपीते का नव प्रयोग कर बीस लाख रुपए की आय की है। क्षेत्र के किसानों के लिए यह अच्छा संकेत है।

जानकारी के अनुसार रमेशकुमार चौधरी वैसे तो सरकारी शारीरिक शिक्षक हंै, लेकिन खेती में नए प्रयोग करते रहते हैं। इस युवक ने सुकल नदी के किनारे भाटवास गांव में एक कृषि कुंए पर दो हैक्टयर भूमि में ताईवानी पपीते लगाने का प्रयोग किया। गत वर्ष मई महीने में रमेशकुमार ने पांच हजार पौधे तैयार किए। इस वर्ष उन पौधों पर पपीते की पैदावार से उसने बीस लाख रुपए की आमदनी कर ली है। चौधरी ने बताया कि उनके इस प्रयोग में कृषि विभाग के अधिकारी कन्हैयालाल विश्नोई ने पूरा सहयोग दिया। शेष & पेज १७

विभाग की बदौलत ही यह उपलब्धि हासिल हो पाई है।

उन्होंने बताया कि वे गत तीन माह से लगातार पपीतों को जयपुर, दिल्ली, जालंधर और जम्मू सहित देश के अन्य भागों में विभिन्न ऐजेंसियों के मार्फत बिक्री के लिए भेज रहे हैं। उत्तम गुणवत्ता व स्वाद से भरपूर ये पपीते इन शहरों में खूब खरीदे जा रहे हैं। इस एक पपीते में पांच से छह किलो तक का वजन होता है। उन्होंने बताया कि गर्मी के मौसम के चलते पपीते की पैदावार काफी प्रभावित हो रही है, परंतु नमी बरकरार रखने के लिए उन्होंने रैनगेज लगवाकर कृत्रिम बरसात करने का प्रयास किया है। इस फसल में उन्हें चार लाख रुपए लगाए हैं तथा अनुभवी किसानों के सहयोग से फसल लेने में सफलता प्राप्त की है। चौधरी के सफल प्रयोग के चलते सुणतर क्षेत्र के धानोल, धामसीन, रोड़ा, सूरजवाड़ा, जेतपुरा, बडग़ांव, अमरापुरा, भाटवास, अदेपुरा, आजोदर सहित कई गांवों के किसान कृषि विभाग से संपर्क कर रहे हैं। विशेषतया लघु सीमांत किसानों के लिए यह फसल वरदान साबित हो सकती है।

इनका कहना

चौधरी की मेहनत व अनुभव से ही यह मिशन सफल हो पाया है। किसानों को इसका लाभ मिलेगा जिससे वे आर्थिक रूप से मजबूत हो सकेंगे।

- कन्हैयालाल विश्नोई, सहायक कृषि अधिकारी, रानीवाड़ा

Saturday, 22 May 2010

खरीफ अभियान २३ से

रानीवाड़ा।
कृषि ज्ञान एवं आदान अभियान २०१० के तहत प्रत्येक ग्रामपंचायत में कृषि शिविरों का आयोजन किया जाएगा। सहायक कृषि अधिकारी कन्हैयालाल विश्रोई ने बताया कि अभियान में कृषि विज्ञान केंद्रों के वैज्ञानिकों व कृषि विभाग के अधिकारियों का सीधा संवाद किसानों से होगा। किसानों की समस्याओं का मौके पर ही समाधान किया जाएगा। इस नए कार्यक्रम में राष्ट्रीय खाद्य सूरक्षा मिशन में दलहनी फसलों की उत्पादकता बढ़ाना, मौसम आधारित फसल बीमा योजना एवं जनजाति क्षैत्रों में बाजरे का उत्पादन बढाने के लिए गोल्डन रेज नाम से प्रोजेक्ट शुरू किया जा रहा है। विश्रोई ने बताया कि 23 मई को चितरोड़ी, 24 को रोपसी व वणधर, 25 को चाटवाड़ा व करड़ा, 26 को कोड़का व दांतवाड़ा, 27 को करवाड़ा व कोटड़ा, 28 को सेवाड़ा, 29 को गांग व कूड़ा, 30 को जालेरा खुर्द व दहीपुर, 31 को रतनपुर, 1 जून को जाखड़ी, 2 को जोड़वास, 3 को धानोल, 4 को धामसीन, 5 को बडग़ांव, 6 को आजोदर, 7 को रानीवाड़ा कलां, 8 को मेड़ा, 9 को सिलासन, 10 को कागमाला, 11 को आखराड़, 12 को मालवाड़ा, 13 को रानीवाड़ा खुर्द, 14 को डूंगरी एव ं15 को सूरजवाड़ा में खरीफ अभियान के तहत शिविरों का आयोजन किया जाएगा।

कागमाला में चौपाल सम्पन्न

रानीवाड़ा।
निकटवर्ती कागमाला ग्रामपंचायत मुख्यालय की रामावि में रात्री कालीन ग्रामीण चौपाल का आयोजन एसडीएम कैलाशचंद्र शर्मा की अध्यक्षता में सम्पन्न हुआ। चौपाल में उपस्थित विभागीय अधिकारियों के द्वारा योजनाओं की प्रगति की समीक्षा कर ग्रामीणों से रूबरू होकर उनकी समस्याओं का निराकरण किया गया। शर्मा ने बताया कि भीलों की ढाणी कागमाला में पेयजल की व्यवस्था को लेकर जसवंतपुरा जलदाय विभाग के एईएन श्यामसुदंर शर्मा को तुरंत समस्या के निस्तारण के लिए पाबंद किया गया। राप्रावि चौधरियों की ढाणी चाण्डपुरा का नाम परिवर्तित करने तथा माध्यमिक विद्यालय में खेल-मैदान की भूमि के आवंटन संंबंधित कार्यों को ग्राम पंचायत में प्रस्ताव पारित कर पंचायत समिति में भिजवाने को लेकर सरपंच व ग्रामसेवक को निर्देश दिए गए।
शर्मा ने ग्रामीणों से कहा कि विभागीय योजनाओं की जानकारी लेकर पात्र व्यक्तिओं से लाभ प्राप्त करने के लिए आवेदन करवाने तथा फायदा उठाने की अपील की गई। अधिकारियों को ग्रामीणों की समस्याओं को ध्यान में रखकर समाधान करवाने की बात कही। जिस परीवार में बुर्जुगों की सार संभाल उनके परिजन नही कर रहे है, उनकी सहायता के लिए राज्य सरकार संकल्परत है। ऐसे बुर्जुग सहयोग के लिए एसडीएम कोर्ट में आवेदन कर सकते है। सरकार उनके पोषण की व्यवस्था करवाएगी।
ब्लॉक सीएमओं डॉ. आत्मराम चौहान ने टीकाकरण, जननी सूरक्षा योजना सहित अन्य स्वास्थ्य विभाग की योजनाओं के बारे में जानकारी दी। बीडीओं ओमप्रकाश शर्मा ने नरेगा, इंद्रावास एवं पंचायती राज की विभिन्न योजनाओं के बारे में बताया। सीडीपीओं संतोष शर्मा ने आंगनवाड़ी केंद्रों पर पोष्टिक आहार के बारे में जानकारी दी। इस अवसर पर विभिन्न सरकारी विभागों के अधिकारियों सहित ग्रामसेवक, पटवारी, पशुधन सहायक, साक्षरता खंड समन्वयक ताराचंद भारद्वाज, समाजसेवी रायमलदेवासी, भूताराम भील, मोहनलाल सैन, प्रकाश कुमार, प्रतापसिंह सहित कई जनों ने भाग लिया।

Saturday, 1 May 2010

बीएलसीसी बैठक संपन्न

रानीवाड़ा& पंचायत समिति सभा भवन में गुरूवार को विकास अधिकारी ओमप्रकाश शर्मा की अध्यक्षता में बीएलसीसी की बैठक हुई। जिसमें क्षेत्र की सभी बैंकों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। शर्मा ने बताया कि एसजीएसवाई के तहत राज्य सरकार के द्वारा दिए गए लक्ष्यों की पूर्ति होने पर सभी बैंकर्स का धन्यवाद दिया। एसजीएसवाई प्रभारी प्रकाश पुरोहित ने बैठक में विस्तृत रूप से समीक्षा पढ़कर सुनाई।

Sunday, 18 April 2010

राहत भरा बिल्व रानीवाड़ा में


रानीवाड़ागर्मी के मौसम में तरोताजा कर देने वाला और कई बीमारियों में औषधि का काम करने वाला बिल्व रानीवाड़ा क्षेत्र के कई गांवों में बहुतायात में पाया जाता है। इन गावों में बिल्व के काफी संख्या में पेड़ हैं। गर्मी के मौसम में बिल्व का जूस काफी राहत भरा और फायदेमंद होता है। ऐसे में किसानों को इससे अच्छी आय हो सकती है। गर्मी के साथ ही इस फल की डिमांड बढ़ गई है। कुछ समय पहले तक रानीवाड़ा समेत सुंधा पर्वतीय क्षेत्र में बिल्व के कई पेड़ थे, लेकिन धीरे धीरे पानी की कमी के कारण अब ये कम होते जा रहे हैं।

यहां हैं बिल्व के पेड़ : वैसे तो कई जगहों पर बिल्व के पेड़ लगे हैं, लेकिन उन पर फल कम ही लग पाते हैं। रानीवाड़ा क्षेत्र में लगे बिल्व पर अच्छे खासे फल लगे हैं। क्षेत्र के जल स्रोतों के समीप यह वृक्ष पाया जाता है। तहसील के रानीवाड़ा खुर्द के पर्वत पर सर्वाधिक बिल्व वृक्ष मिलते हैं। यहां सैकड़ों की तादात में वृक्षों के पाए जाने से श्रावण मास में बिल्व पत्र के लिए श्रृद्घालुओं की भीड़ लगी रहती है।

इस स्थान को बिल्व का गाला भी बोलते हंै। इसके अलावा धानोल व भंवरिया के शिव मंदिरों तथा रायपुर, हड़मतियां के पुष्पेंद्रसिंह कृषि फार्म और सूरजवाड़ा खाकीजी की वाड़ीपर भी बिल के अनेक पेड़ लगे हैं।

सुंधा क्षेत्र में हुए कम

रानीवाड़ा और सुंधा पर्वतीय क्षेत्र में बिल्व के कई पेड़ थे। पिछले कुछ सालों में सुंधा पर्वतीय क्षेत्र में इन पेड़ों की संख्या घट गई है। इसका मुख्य कारण पानी की कमी है। पहाड़ों में कुछ साल पहले तक प्रचुर संख्या में बिल्व पेड़ दिखाई देते थे, परंतु पेयजल स्रोत सूखने से इनकी संख्या घटती गई।

कितना उपयोगी बिल्व

बिल्व के उपयोगी भाग फल, पत्ती, जड़, छाल बीज और फूल होते हंै। अर्थात वृक्ष का हर हिस्सा लाभदायक व उपयोगी है। गोधाम पथमेड़ा के सुमन सुलभ ब्रह्मचारी महाराज के अनुसार बिल्व केफल का शर्बत बनाकर पीने से पेट के जटिल रोग व अल्सर समाप्त हो जाता है। बिल्व के पेड़ से फल तोडऩे की भी एक निश्चित प्रक्रिया होती है, तब भी उसकी सार्थकता सिद्घ होती है। बिल्व ऊपर से सख्त, लेकिन अंदर से रसयुक्त, मीठा और नरम होता है। पके हुए फल का शर्बत स्वादिष्टï होता है। इसके पेड़ की छाया भी शीतल होती है। आयुर्वेद में बिल्व का फल आंतों की बीमारी में लाभदायक माना जाता है। यह वायु रोग, हृदय रोग, बुखार और अनिद्रा रोग में भी लाभदायक होता है।

Friday, 16 April 2010

जायद में पर्याप्त बिजली आपूर्ति की मांग

रानीवाड़ा
उपखंड क्षेत्र के किसानों ने जायद की फसल में पर्याप्त मात्रा में बिजली आपूर्ति करने की मांग को लेकर एसडीएम को मुख्यमंत्री के नाम ज्ञापन सौंपा है। भारतीय किसान संघ के तहसील अध्यक्ष चेणीदान चारण ने बताया कि गर्मी के मौसम के चलते जायद ऋतु की फसल में इस समय सरकार मात्र चार घंटे किसानों को बिजली आपूर्ति कर रही है, जो बहुत ही कम है। क्षेत्र में भू-जल स्तर रसातल में पहुंच गया है। फिर भी बडग़ांव, धानोल, जाखड़ी, सूरजवाड़ा और रोड़ा सहित कई गांवों में अभी भी प्रचुर मात्रा में कृषि योग्य भू-जल उपलब्ध होने के कारण किसान जायद ऋतु में बाजरे की फसल भारी पैमाने पर बुवाई करते हैं। उन्होंने बताया कि मीटर प्रणाली से किसानों को चार गुना बिल भरने पड़ रहे हैं जिससे उनकी आर्थिक स्थिति बिगड़ रही है। इस अवसर पर अध्यक्ष सोमाराम चौधरी, भंवरदान धूलिया, बाबूराम जाखड़ी, करसन देवासी और करणीदान सहित कई किसान नेता उपस्थित थे।

Friday, 9 April 2010

मुआवजा राशि में भेदभाव का आरोप लगाया

रानीवाड़ा
खरीफ की फसल में हुए नुकसान की भरपाई के लिए दिए जा रहे मुआवजा राशि को लेकर किसानों ने प्रशासन पर भेदभाव का आरोप लगाया है। पंचायत समिति सदस्य सायतीदेवी विश्नोई ने बताया मौखातरा गांव में दर्जनों किसानों के साथ भेदभाव कर मुआवजे से वंचित किया गया है। इसी प्रकार रानीवाड़ा कस्बे के दो दर्जन किसानों ने गुरूवार को तहसीलदार खेताराम सारण से मिलकर अतिरिक्त सूची में नाम जुड़वाने की मांग की है। किसान भीखाराम मेघवाल ने बताया कि पटवारी द्वारा सर्वे सही नहीं कर पटवारघर में बैठ कर गिरदावरी भरी गई है। उन्होंने कहा कि सही मुआवजा राशि नहीं देने पर विरोध प्रर्दशन किया जाएगा।

Sunday, 21 March 2010

सफेद मूसली ने बदली तकदीर


गुमानसिंह राव
रानीवाड़ा
सुणतर क्षेत्र के एक किसान ने कुछ वर्ष पूर्व १०० किलो उत्पादन के साथ सफेद मूसली की खेती शुरू की। अब वह २० क्विंटल तक ऊपज ले रहे हैं। धानोल निवासी प्रगतिशील किसान बाबूलाल चौधरी ने क्षेत्र के दूसरे किसानों के लिए एक मिसाल कायम की है।
आलू की भांति मेढ़ों पर सफेद मूसली की बुवाई बरसात से पहले की जाती है जाड़े में निराई-गुड़ाई के बाद करीब ९ माह के बाद गर्मी में पत्तियां सूख जाने पर उत्पादन लिया जाता है। अब क्षेत्रीय किसानों का रुझान आयुर्वेद से संबंधित जड़ीबूटियों की खेती की तरफ बढ़ रहा है। बाबूलाल का कहना है कि वर्ष 200६ में नागौर जिले के लाडनूं से वे 20 किलो सफेद मूसली का रोप लाकर रोपा था। हर वर्ष वे इसमें बढ़ोतरी करते गए। मौजूदा समय में पांच बीघा खेत में २० क्विंटल सफेद मूसली की खेती हो रही है। क्लोरो फाइटम बोरिबेलियम के वैज्ञानिक नाम वाले इस सफेद मूसली को भारत में शक्तिवर्धक के रूप में पहचान मिली है। यहां की सफेद मूसली की मांग विदेशों में अत्यधिक है, लेकिन सफेद मूसली का उत्पादन कर रहे क्षेत्र के किसानों को अभी कुछ अड़चने आ रही हैं। सरकार द्वारा सफेद मूसली की खेती को बढ़ावा नहीं दिया गया और न ही इसके लिए कोई बाजार ही निर्धारित किया गया है। शेष & पेज 9 पर
चौधरी ने बताया कि पांच वर्ष पूर्व सफेद मूसली के बीज की कीमत छह सौ रुपए प्रति किलो थी, लेकिन अब इसका दाम बढ़कर 16 सौ रुपए प्रति किलो हो गया है। उन्होंने किसानों को सलाह दी है कि परख कर अच्छे बीज की रोपाई की जाए तो प्रति बीघे चार क्विंटल सफेद मूसली की पैदावार की जा सकती है। इससे एक तरफ जहां परम्परागत कृषि को छोड़कर किसान औषधीय पौधों की खेती की ओर आकृष्ट होने लगे हैं, वहीं उच्च शिक्षा प्राप्त ऐसे युवक भी, जो अभी तक खेती-किसानी के कार्य को केवल कम पढ़े-लिखे लोगों का व्यवसाय मानते थे, औषधीय पौधों की खेती अपनाकर स्वयं को गौरवान्वित महसूस करने लगे हैं।
यह है घटक
सफेद मूसली में कार्बोहाईड्रेट्स 42 प्रतिशत, प्रोटीन 8 से 9 प्रतिशत, सैपोजिन्स 2 से 17 प्रतिशत, रेशा 3 से 4 प्रतिशत, एल्कलोंयड्स 25, विटामिन ए, बी, डी तथा ई, ग्लूकोसइड्स, अमीनो अम्ल स्टरयोरड्स आदि और खनिज लवण 7 से 15 प्रतिशत तक पाए जाते हैं। सैपोजिन्स की मात्रा के आधार पर ही इसका मूल्य निर्धारण होता है।
क्या है फायदा
मात्र 6 से 8 माह में प्रति एकड़ एक से दो लाख रुपए का शुद्ध लाभ देने वाली और कोई फसल नहीं है। इसकी किसी प्रकार की प्रोसेसिंग करने की आवश्यकता नहीं, कोई मशीन लगाने की जरूरत नहीं। इसे किसान सीधे उखाड़ कर, छील कर तथा सुखा कर बेच सकते हैं। सफेद मूसली के लिए व्यापक बाजार उपलब्ध है। इसलिए इसकी खेती रोजगार का एक सुनहरा अवसर उपलब्ध कराती है। मौसम में परिवर्तन से इस पर कोई असर नहीं पड़ता। सफेद मूसली की खेती पूरे राजस्थान में की जा सकती है।
अनुकूल है वातावरण
सफेद मूसली के उत्पादन के लिए उष्ण व उपोष्ण कटिबन्धीय जलवायु की आवश्यकता होती है यही कारण है कि यह अरावली की पहाङियों में विशेष रूप पाई जाती है चूंकि यह कठोर प्रकृति का पौधा है इसलिए इसे विभिन्न प्रकार की जलवायु में उगाया जा सकता है। मूसली की फसल में प्राय: कोई विशेष बीमारी नहीं देखी गयी है अत: इसमें किसी प्रकार के कीटनाशकों का उपयोग करने की कोई जरूरत नहीं है। इसका प्रमुख कारण यह है कि पौधे का कन्द भूमि में नीचे रहता है। इस फसल पर किन्ही प्राकृतिक आपदाओं जैसे ओलावृष्टि, पाला, और कुहासा आदि का प्रभाव नहीं हो पाता। वैसे यह पैाधा किसी प्रकार की बीमारी या प्राकृतिक आपदाओं के प्रभाव मुक्त है।
औषधीय उपयोग
सफेद मूसली शक्तिवर्धक, मेधावर्धक, प्रसवोपरान्त शारीरिक क्षतिपूर्ति, हृदय दुर्बलता, टॉनिक स्वरूप, बुढ़ापे में कमजोरी दूर करने वाली प्रसिद्ध औषधि, प्रजनन क्षमता में वृद्धि के लिए उपयोगी, माताओं में दूध बढ़ाने के लिए भी उपयोगी है। सफेद मूसली को 'दूसरी शिलाजीतÓ की संज्ञा दी जाती है, चीन, उत्तरी अमेरिका में पाए जाने वाले पौधे जिन्सेंग का विकल्प माना गया है विदेशों में इससे कैलांग जैसे फ्लेक्स बनाए जाते हैं जिनका पौष्टिक नाश्ते के रूप में उपयोग किया जाता है।
विपणन की व्यवस्था
धानोल में कार्य लाडनूं औषधीय पादप एंड प्रौसेसिंग सहकारी समिति के द्वारा हो रहा है। समिति के प्रबंध निदेशक विजेंद्र विश्रोई ने बताया कि समिति किसान को ५०० सौ रुपए प्रति किग्रा के अनुसार बीज उपलब्ध करवाती है तथा ५०० सौ रुपए के हिसाब से गीली मूसली किसान से खरीद करती है। इस तरह किसान को चार गुनी आय होती है। कम जमीन में ज्यादा पैदावार होने से क्षेत्र में यह फसल लोकप्रिय होती जा रही है।