Hot News अभी - अभी

रतनपुर में गाय पर हमला करने वाले युवक गिरफ्तार, रानीवाडा उपखंड की ताजा खबरों के आपका स्वागत।।
Showing posts with label Medicine. Show all posts
Showing posts with label Medicine. Show all posts

Thursday, 22 April 2010

पेयजल आपूर्ति को लेकर माहौल गर्माया

रानीवाड़ा।
नवगठित पंचायत समिति की साधारण सभा की पहली बैठक विधायक रतन देवासी की देखरेख व प्रधान श्रीमती राधादेवी देवासी की अध्यक्षता में हुई । बैठक में सदस्यों ने पेयजल, सड़क, नरेगा जैसे मुद्दे प्रमुखता से उठाए। इस दौरान माहौल भी गर्मा गया। विधायक देवासी ने क्षेत्र में पेयजल आपूर्ति सुचारू नहीं कर पाने के लिए पीएचईडी के एईएन की जोरदार खिंचाई की। सरपंचों ने पेयजल की गंभीर समस्या के समाधान हेतु टेंकरों से पानी उपलब्ध कराने की मांग को लेकर विधायक को अवगत कराया। इस बैठक में उपखंड अधिकारी कैलाशचंद्र शर्मा, उपप्रमुख मूलाराम राणा, तहसीलदार खेताराम सारण भी मौजूद थे। बैठक का शुभारंभ विकास अधिकारी ओमप्रकाश शर्मा ने गत बैठक की कार्रवाई को लेकर किया।

विधायक ने बताया - रतन देवासी ने कहा कि कस्बे के सौंदर्यकरण को लेकर डीजाईन का कार्य पूरा हो चुका है। तीन चौराहै का निर्माण प्रथम चरण में होगा। समिति परिसर में शोपिंग कॉम्पलेक्श की डिजाईन का कार्य प्रगति पर है। परिसर में ही भव्य दरवाजा व सुलभ शौचालय का निर्माण करवाया जाएगा। उक्त निर्माण कार्य प्रसिद्ध आर्किटेक्ट के दिशा निर्देशन में नई आकर्षक डिजाईन में करवाया जाएगा। उन्होंने कहा कि पेयजल समस्या प्राकृतिक है। जिसके समाधान के लिए राज्य सरकार संवेदनशील है। कन्टेजेन्सी प्लॉन में ज्यादा से ज्यादा राशि आंवटित की गई है। शीघ्र ही ग्राम पंचायत के माध्यम से गांव गांव ढाणी ढाणी टंैंकर की व्यवस्था शुरू करवाई जाएगी। उन्होंने बताया कि पेयजल की समस्या अधिकतर गांवों में एवजी लाईनमेन के कारण पैदा हुई है। उनकों हटाने के लिए राज्य सरकार को पत्र लिखा जाएगा। देवासी ने कहा कि पानी का दुरूपयोग रोकने के लिए फ्लाईंग की टीम गठित की गई है। जिसमें एसडीएम, एईएन, सरपंच व पुलिस विभाग संयुक्त रूप से कार्रवाई करेंगे। वणधर में ऑपनवेल स्वीकृत हो चुका है, शीघ्र ही कार्य शुरू होगा। जीएलआर में जलापूर्ति सूचारू रूप से करवाने के लिए अवैध कनेक्शन कटवाने के लिए शीघ्र ही अभियान शुरू किया जाएगा। नर्मदा से पेयजल लाने के लिए हमने मुख्यमंत्री से मिलकर निवेदन किया है, आशा है कि उक्त योजना शीघ्र ही स्वीकृत हो जाएगी। देवासी ने कहा कि ग्रामीण क्षेत्र में घरेलू विद्युत आपूर्ति अब दोपहर 12 से 6 व शाम ६ से सुबह ६ बजे तक की जाएगी। प्रधानमंत्री मद से वंचित ढाणियों व गांवों को डामर सड़कों से जोड़ा जाएगा। इस सत्र में सात राउप्रावि को क्रमोन्नत किया गया है। साथ ही मालवाड़ा में विज्ञान संकाय व रानीवाड़ा कस्बे की बालिका विद्यालय में वाणिज्य संकाय शुरू किया गया है। सर्व शिक्षा अभियान के तहत पौशाक वितरण व अग्रिशमन यंत्र की खरीद में पारदर्शिता नही होने से जांच करवाई जाएगी। उन्होंने स्वास्थ्य विभाग के कर्मचारियों के द्वारा अवैध प्रेक्टिस कर गरीब मरीजों को सीएचसी तक नही पहुंचने के मसले को गंभीरता से लेकर एसडीएम को जांच करवाने के निर्देश दिए। उन्होंने कहा कि महिला व बालविकास विभाग के द्वारा 19 आंगनवाड़ी केंद्र व 14 मिनी आगंनवाड़ी केंद्र स्वीकृ त करवाए है, जिनमें कार्यकर्ताओं की भर्ति अतिशीघ्र की जाएगी। देवासी ने कहा कि पंचायत समिति परिसर में विकास वाटिका के रूप में सुंदर बगीचा बनाया जाएगा। साथ ही प्रधान के लिए नया भवन व सभा भवन में सभी सदस्यों के लिए माईक की व्यवस्था शीघ्र ही करवाई जा रही है। समिति की नीजि आय बढाने के लिए शौपिंग कॉम्पलेक्श बनाया जा रहा है।

बाद में एसडीएम कैलाशचंद्र शर्मा ने कहा कि फोटो पहचान पत्र का अभियान शुरू किया गया है। विभिन्न पंचायत मुख्यालय पर तय तिथि पर फोटो पहचान पत्र से वंचित लोग इसका लाभ ले सकते है। पंचायत मुख्यालयों पर राजीवगांधी ई केंद्र के भवन अगस्त से पूर्व निर्वित करने के निर्देश दिए। शर्मा ने कहा एसएसएफसी के द्वारा सभी पंचायतों को जनसंख्या अनुपात में राशि जारी की गई है। उक्त राशि को सरपंच पेयजल योजनाओं में ही खर्च कर सकते है। सरपंच चाहे तो उक्त राशि से हैडपंप, पाईप लाईन, हैडपंप पर मोटर लगाने जैसे कार्य कर सकते हैं। उन्हानें कहा कि एसडीएम की अध्यक्षता में कमेटी का गठन किया गया है। जोकि ग्रामीण क्षेत्र में ग्राम पंचायत के माध्यम से टैंकर के द्वारा पेयजल आपूर्ति की व्यवस्था सुनिश्चित करेगी।

पेयजल का मुद्दा गरमाया - जलदाय विभाग के सहायक अभियंता रामनिवास यादव ने पेयजल की समस्या व समाधान को लेकर ग्राम पंचायत वार विस्तार से जानकारी सदन को अवगत करवाई। उन्होंने बताया कि इस वर्ष 11 ट्युबवेल व 34 हैडपंप तैयार करवाए गए है, जो सुचारू रूप से चल रहे है। इस दौरान पेयजल की समस्या को लेकर रानीवाड़ा सरपंच गोदाराम देवासी ने कस्बे के बाईपास पर ऑवर हैडटंैक, बडग़ांव रोड़ की भील बस्ती में पेयजल समस्या के बारे में जानकारी दी। जालेराकलां के डेलीगेट वागाराम ने तावीदर में पेयजल संकट का मुद्दा उठाया। रानीवाड़ा खुर्द सरपंच करमीराम ने सांईजी की बैरी के जीएलआर में लंबे समय से जलापूर्ति नही होने की बात कही। गांग सरपंच भूराराम ने गांग में एवजी लाईनमैन की शिकायत बताई। उन्होंने हिरपुरा, चिमनगढ लाईन पर अवैध कनेक्शन को हटाने की गुहार लगाई। कोटड़ा सरपंच सहीराम विश्रोई ने मौखातरा में एवजी लाईन मैन लगाने की शिकायत की। करवाड़ा डेलीगेट छगनाराम ने ढाणियों में पेयजल संकट के बारे में सदन को जानकारी दी। जाखड़ी सरपंच शांतादेवी दर्जी ने रेबारियों की ढाणी व चारणवास में पेयजल समस्या के बारे में कहा। जोडवास डेलीगेट पूरणसिंह देवड़ा ने नर्मदा का पानी उपलब्ध करवाने के लिए शीघ्र योजना स्वीकृत करवाने को लेकर सदन में सर्वसम्मति से प्रस्ताव लेने की बात कही। धानोल सरपंच भीखाराम ने आठ स्कूलों में पेयजल संकट होने की बात कही। मालवाड़ा डेलीगेट दिवाली काबा ने मालवाड़ा कस्बे में ऑवर हैंड टैंक स्वीकृत करवाने की मांग रखी। आखराड़ में रेलवे स्टेशन के पास भीलों की ढाणी हैंडपंप खुदवाने की गुहार लगाई।

विद्युत पर छिडी बहस - विद्युत विभाग के कनिष्ठ सौरभसिंह ने विभाग के द्वारा चल रहे कार्यो के बारे में जानकारी दी। उन्होंने बताया कि इस वर्ष २०५ सामान्य श्रेणी के कनेक्शन, १८ एससी, ५७० कुटीर ज्योति व 4 जलदाय विभाग के नए कनेक्शन दिए गए है। मारूवाड़ा, सेवाड़ा व रानीवाड़ा खुर्द में 33केवी स्टेशन की प्रक्रिया चल रही है। बडग़ांव में 132 केवी स्टेशन 2 महिने में शुरू होने की संभावना है। धामसीन सरपंच बलवंत पुरोहित ने कहा कि ग्रामीण क्षेत्र में सिर्फ रात्री को ही घरेलू विद्युत आपूर्ति दी जा रही है, जिससे दिन को गर्मी के मौसम में लोगों को परेशान होना पड रहा है। धानोल सरपंच भीखाराम चौधरी ने जायद की फसल में पर्याप्त मात्रा में कृषि विद्युत आपूर्ति कराने का निवेदन किया। रानीवाड़ा सरपंच गोदाराम देवासी ने बीपीएल कनेक्शन के लिए नई फाईलें जमा कराने का मुद्दा उठाया, उन्होंने बताया कि विभाग के द्वारा नही ली जा रही है।
पीडब्ल्यूडी एईएन अमृतलाल वर्मा ने नरेगा सहित अन्य योजनाओं के तहत चल रहे कार्यो के बारे में बताया। उन्होंने बताया कि कस्बे के राउमावि खेल मैदान में 25 लाख रूपयें की लागत से स्टेडियम बनाया जाएगा। कृषि विभाग के कन्हैयालाल विश्रोई सरकार की योजनाओं के बारे में बताया। एसएसए के बीआरसीएफ तेजाराम ने विभाग की गतिविधियां, कम्प्यूटर शिक्षा, पौशाक वितरण, अग्रिशमन यंत्र, शौचालय निर्माण व छात्रवृतियों के बारे में जानकारी दी। सीडीपीओं संतोष शर्मा ने सुपरवाईजर की कमी की बात कही।

ऐतिहासिक बैठक - पंचायत समिति सभा भवन में आयोजित आज की बैठक
को ऐतिहासिक माना गया है। यह बैठक दोपहर 12 बजे से शाम 7 बजे तक आयोजित की गई। विधायक देवासी के दिशा निर्देशन में आयोजित इस बैठक में सभी विभागों के अधिकारियों को भारी कसरत करनी पडी। उन्होंने हर विभाग के अधिकारी को ग्राम पंचायत वार समस्या के समाधान को लेकर सवाल-जवाब किए। जलदाय विभाग पर चर्चा लगभग तीन घंटे तक चली। बैठक में महिला सदस्य घुंघट धारण किए चुपचाप बैठी रही।

सरपंच अंदर, प्रतिनिधि बाहर - बैठक में ऐसा पहली बार देखा गया कि इसमें किसी भी महिला जनप्रतिनिधियों के प्रतिनिधि को प्रवेश नही दिया गया, सभी प्रतिनिधि सभा भवन के बाहर खडे रहे। कुछ ने विरोध भी जताया, परंतु सभाध्यक्ष ने उनकों प्रवेश नही दिया।

Sunday, 18 April 2010

राहत भरा बिल्व रानीवाड़ा में


रानीवाड़ागर्मी के मौसम में तरोताजा कर देने वाला और कई बीमारियों में औषधि का काम करने वाला बिल्व रानीवाड़ा क्षेत्र के कई गांवों में बहुतायात में पाया जाता है। इन गावों में बिल्व के काफी संख्या में पेड़ हैं। गर्मी के मौसम में बिल्व का जूस काफी राहत भरा और फायदेमंद होता है। ऐसे में किसानों को इससे अच्छी आय हो सकती है। गर्मी के साथ ही इस फल की डिमांड बढ़ गई है। कुछ समय पहले तक रानीवाड़ा समेत सुंधा पर्वतीय क्षेत्र में बिल्व के कई पेड़ थे, लेकिन धीरे धीरे पानी की कमी के कारण अब ये कम होते जा रहे हैं।

यहां हैं बिल्व के पेड़ : वैसे तो कई जगहों पर बिल्व के पेड़ लगे हैं, लेकिन उन पर फल कम ही लग पाते हैं। रानीवाड़ा क्षेत्र में लगे बिल्व पर अच्छे खासे फल लगे हैं। क्षेत्र के जल स्रोतों के समीप यह वृक्ष पाया जाता है। तहसील के रानीवाड़ा खुर्द के पर्वत पर सर्वाधिक बिल्व वृक्ष मिलते हैं। यहां सैकड़ों की तादात में वृक्षों के पाए जाने से श्रावण मास में बिल्व पत्र के लिए श्रृद्घालुओं की भीड़ लगी रहती है।

इस स्थान को बिल्व का गाला भी बोलते हंै। इसके अलावा धानोल व भंवरिया के शिव मंदिरों तथा रायपुर, हड़मतियां के पुष्पेंद्रसिंह कृषि फार्म और सूरजवाड़ा खाकीजी की वाड़ीपर भी बिल के अनेक पेड़ लगे हैं।

सुंधा क्षेत्र में हुए कम

रानीवाड़ा और सुंधा पर्वतीय क्षेत्र में बिल्व के कई पेड़ थे। पिछले कुछ सालों में सुंधा पर्वतीय क्षेत्र में इन पेड़ों की संख्या घट गई है। इसका मुख्य कारण पानी की कमी है। पहाड़ों में कुछ साल पहले तक प्रचुर संख्या में बिल्व पेड़ दिखाई देते थे, परंतु पेयजल स्रोत सूखने से इनकी संख्या घटती गई।

कितना उपयोगी बिल्व

बिल्व के उपयोगी भाग फल, पत्ती, जड़, छाल बीज और फूल होते हंै। अर्थात वृक्ष का हर हिस्सा लाभदायक व उपयोगी है। गोधाम पथमेड़ा के सुमन सुलभ ब्रह्मचारी महाराज के अनुसार बिल्व केफल का शर्बत बनाकर पीने से पेट के जटिल रोग व अल्सर समाप्त हो जाता है। बिल्व के पेड़ से फल तोडऩे की भी एक निश्चित प्रक्रिया होती है, तब भी उसकी सार्थकता सिद्घ होती है। बिल्व ऊपर से सख्त, लेकिन अंदर से रसयुक्त, मीठा और नरम होता है। पके हुए फल का शर्बत स्वादिष्टï होता है। इसके पेड़ की छाया भी शीतल होती है। आयुर्वेद में बिल्व का फल आंतों की बीमारी में लाभदायक माना जाता है। यह वायु रोग, हृदय रोग, बुखार और अनिद्रा रोग में भी लाभदायक होता है।

Sunday, 21 March 2010

सफेद मूसली ने बदली तकदीर


गुमानसिंह राव
रानीवाड़ा
सुणतर क्षेत्र के एक किसान ने कुछ वर्ष पूर्व १०० किलो उत्पादन के साथ सफेद मूसली की खेती शुरू की। अब वह २० क्विंटल तक ऊपज ले रहे हैं। धानोल निवासी प्रगतिशील किसान बाबूलाल चौधरी ने क्षेत्र के दूसरे किसानों के लिए एक मिसाल कायम की है।
आलू की भांति मेढ़ों पर सफेद मूसली की बुवाई बरसात से पहले की जाती है जाड़े में निराई-गुड़ाई के बाद करीब ९ माह के बाद गर्मी में पत्तियां सूख जाने पर उत्पादन लिया जाता है। अब क्षेत्रीय किसानों का रुझान आयुर्वेद से संबंधित जड़ीबूटियों की खेती की तरफ बढ़ रहा है। बाबूलाल का कहना है कि वर्ष 200६ में नागौर जिले के लाडनूं से वे 20 किलो सफेद मूसली का रोप लाकर रोपा था। हर वर्ष वे इसमें बढ़ोतरी करते गए। मौजूदा समय में पांच बीघा खेत में २० क्विंटल सफेद मूसली की खेती हो रही है। क्लोरो फाइटम बोरिबेलियम के वैज्ञानिक नाम वाले इस सफेद मूसली को भारत में शक्तिवर्धक के रूप में पहचान मिली है। यहां की सफेद मूसली की मांग विदेशों में अत्यधिक है, लेकिन सफेद मूसली का उत्पादन कर रहे क्षेत्र के किसानों को अभी कुछ अड़चने आ रही हैं। सरकार द्वारा सफेद मूसली की खेती को बढ़ावा नहीं दिया गया और न ही इसके लिए कोई बाजार ही निर्धारित किया गया है। शेष & पेज 9 पर
चौधरी ने बताया कि पांच वर्ष पूर्व सफेद मूसली के बीज की कीमत छह सौ रुपए प्रति किलो थी, लेकिन अब इसका दाम बढ़कर 16 सौ रुपए प्रति किलो हो गया है। उन्होंने किसानों को सलाह दी है कि परख कर अच्छे बीज की रोपाई की जाए तो प्रति बीघे चार क्विंटल सफेद मूसली की पैदावार की जा सकती है। इससे एक तरफ जहां परम्परागत कृषि को छोड़कर किसान औषधीय पौधों की खेती की ओर आकृष्ट होने लगे हैं, वहीं उच्च शिक्षा प्राप्त ऐसे युवक भी, जो अभी तक खेती-किसानी के कार्य को केवल कम पढ़े-लिखे लोगों का व्यवसाय मानते थे, औषधीय पौधों की खेती अपनाकर स्वयं को गौरवान्वित महसूस करने लगे हैं।
यह है घटक
सफेद मूसली में कार्बोहाईड्रेट्स 42 प्रतिशत, प्रोटीन 8 से 9 प्रतिशत, सैपोजिन्स 2 से 17 प्रतिशत, रेशा 3 से 4 प्रतिशत, एल्कलोंयड्स 25, विटामिन ए, बी, डी तथा ई, ग्लूकोसइड्स, अमीनो अम्ल स्टरयोरड्स आदि और खनिज लवण 7 से 15 प्रतिशत तक पाए जाते हैं। सैपोजिन्स की मात्रा के आधार पर ही इसका मूल्य निर्धारण होता है।
क्या है फायदा
मात्र 6 से 8 माह में प्रति एकड़ एक से दो लाख रुपए का शुद्ध लाभ देने वाली और कोई फसल नहीं है। इसकी किसी प्रकार की प्रोसेसिंग करने की आवश्यकता नहीं, कोई मशीन लगाने की जरूरत नहीं। इसे किसान सीधे उखाड़ कर, छील कर तथा सुखा कर बेच सकते हैं। सफेद मूसली के लिए व्यापक बाजार उपलब्ध है। इसलिए इसकी खेती रोजगार का एक सुनहरा अवसर उपलब्ध कराती है। मौसम में परिवर्तन से इस पर कोई असर नहीं पड़ता। सफेद मूसली की खेती पूरे राजस्थान में की जा सकती है।
अनुकूल है वातावरण
सफेद मूसली के उत्पादन के लिए उष्ण व उपोष्ण कटिबन्धीय जलवायु की आवश्यकता होती है यही कारण है कि यह अरावली की पहाङियों में विशेष रूप पाई जाती है चूंकि यह कठोर प्रकृति का पौधा है इसलिए इसे विभिन्न प्रकार की जलवायु में उगाया जा सकता है। मूसली की फसल में प्राय: कोई विशेष बीमारी नहीं देखी गयी है अत: इसमें किसी प्रकार के कीटनाशकों का उपयोग करने की कोई जरूरत नहीं है। इसका प्रमुख कारण यह है कि पौधे का कन्द भूमि में नीचे रहता है। इस फसल पर किन्ही प्राकृतिक आपदाओं जैसे ओलावृष्टि, पाला, और कुहासा आदि का प्रभाव नहीं हो पाता। वैसे यह पैाधा किसी प्रकार की बीमारी या प्राकृतिक आपदाओं के प्रभाव मुक्त है।
औषधीय उपयोग
सफेद मूसली शक्तिवर्धक, मेधावर्धक, प्रसवोपरान्त शारीरिक क्षतिपूर्ति, हृदय दुर्बलता, टॉनिक स्वरूप, बुढ़ापे में कमजोरी दूर करने वाली प्रसिद्ध औषधि, प्रजनन क्षमता में वृद्धि के लिए उपयोगी, माताओं में दूध बढ़ाने के लिए भी उपयोगी है। सफेद मूसली को 'दूसरी शिलाजीतÓ की संज्ञा दी जाती है, चीन, उत्तरी अमेरिका में पाए जाने वाले पौधे जिन्सेंग का विकल्प माना गया है विदेशों में इससे कैलांग जैसे फ्लेक्स बनाए जाते हैं जिनका पौष्टिक नाश्ते के रूप में उपयोग किया जाता है।
विपणन की व्यवस्था
धानोल में कार्य लाडनूं औषधीय पादप एंड प्रौसेसिंग सहकारी समिति के द्वारा हो रहा है। समिति के प्रबंध निदेशक विजेंद्र विश्रोई ने बताया कि समिति किसान को ५०० सौ रुपए प्रति किग्रा के अनुसार बीज उपलब्ध करवाती है तथा ५०० सौ रुपए के हिसाब से गीली मूसली किसान से खरीद करती है। इस तरह किसान को चार गुनी आय होती है। कम जमीन में ज्यादा पैदावार होने से क्षेत्र में यह फसल लोकप्रिय होती जा रही है।

Sunday, 7 February 2010

अब महकेगी केसर क्यारी


गुमानसिंह राव. रानीवाड़ा

जलवायु और मौसम ने साथ दिया तो रानीवाड़ा क्षेत्र अब केसर की महक से महकेगा। एक प्रयोग के तहत उपखंड मुख्यालय से सिर्फ 20 किलोमीटर की दूरी पर प्रायोगिक तौर पर केसर की खेती की गई है। जिसके सफल होने की काफी संभावना है।

गांव में बसंत ऋ तु के आते ही खुशबूदार और कीमती जड़ी-बूटी 'केसरÓ की बहार आ रही है। वर्ष के अधिकतर समय ये खेत अन्य फसलों से लहलहातेे थे, लेकिन फरवरी के अंत तक ये खेत बैंगनी रंग के फूलों से सजने लग जाऐंगे। धानोल के केवाराम चौधरी व जाखड़ी के वनैसिंह देवड़ा ने धानोल में यह प्रयोग किया है। इन किसानों ने बताया कि गत वर्ष भी उन्होंने माउंट आबु के ब्रह्माकुमारी संस्थान से केसर के बीज लाकर लघु प्रयोग कर केसर की पैदावार तैयार की थी। इस बार कुछ ज्यादा मात्रा में केसर की क्यारिया तैयार की है। उन्होंने कहा कि कृषि विभाग का सहयोग नही मिलने के कारण इस कीमती फसल को प्रोत्साहन नहीं मिल रहा है। अनुकूल जलवायु के चलते इस फसल का प्रयोग काफी हद तक सफल रहा है। बकौल, केवाराम उन्होंने गत वर्ष तैयार केसर को शादी के समय दूध के साथ मिलाकर मेहमानों को सेवन कराया था। सुणतर के केसर का स्वाद भी स्वादिष्ट होने के कारण इस फसल के परिणाम भविष्य के लिए सकारात्मक आने की उम्मीद है।

इनका कहना

केसर का खेती करने वाले ने बताया कि गत वर्ष केसर कम तैयार हुआ था परंतु, फिर भी उम्मीद है कि इस बार बीते साल से उत्पादन ज्यादा होगा और दाम भी अच्छे मिलेंगे।

-केवाराम चौधरी, किसान, धानोल

इस प्रयोग के सफल होने पर विभाग इस खेती की ओर ध्यान देगा। अभी तो देख रहे है। वैसे जिले के कृषि अधिकारियों के लिए नया प्रयोग है। पौधे की ऊंचाई डेढ़ फीट है, फू ल आने पर ही मालूम पड़ेगा।

-कन्हैयालाल विश्नोई, सहायक कृषि अधिकारी, रानीवाड़ा

Saturday, 6 February 2010

निशुल्क शिविर आज

रानीवाड़ा! ग्लोबल हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर माउंट आबू व स्थानीय बी.के. संस्थान के तत्वाधान में कस्बे के आकाश मार्केट में माह के प्रथम शनिवार को निशुल्क चिकित्सा शिविर का आयोजन किया जाएगा। शिविर में सर्जन डा. संजयकुमार वर्मा मरीजों की निशुल्क जांच कर परामर्श देंगे। इस शिविर में पित्ताशय की पथरी, एपेंडिक्स, आंतो की गाठ, आमाशय, केंसर, गुर्दारोग, मूत्र रोग सहित पाईल्स की बिमारियों की जांच कर परामर्श प्रदान करेंगे। शिविर में नशामुक्ति के लिए निशुल्क दवाइयां भी उपलब्ध करवाई गई हैं।

Sunday, 31 January 2010

अफ्रीकन चिकोरी अब सुणतर में

रानीवाड़ा

दक्षिण अफ्रीका व ईजराईल में प्रचुर मात्रा में पैदा होने वाली प्रोटिनयुक्त चिकोरी औषधी सुणतर क्षेत्र के धामसीन गांव में पहुंच गई है। इस गांव में इस औषधीय पौधे की खेती की जा रही है और अगर यह सफल होती है तो यकीनन किसानों के लिए काफी फायदेमंद होगी। औषधी निर्माण के अलावा इस पौधे का उपयोग कॉफी पाउडर में भी किया जाता है। पालनपुर निवासी अरविंद पटेल ने धामसीन के भीमसिंह देवड़ा के कृषि फार्म पर प्रथम बार प्रयोग कर औषधीय खेती में क्रांतिकारी बदलाव लाए हैं।

क्या है चिकोरी : चिकोरी एक प्रकार का पौधा है। जिसकों जड़ों में प्रोटिन प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। कसैला स्वाद होने के कारण इस औषधि को काफी में मिक्स किया जाता है। पटेल के अनुसार इस पौधे की जड़ों को आयुर्वेदिक औषधि बनाने में किया जाता है। इसका बीज ईजराईल से मंगवाया जाता है। पौधा सूखने के बाद स्वादिष्ट होने से इसको दुधारू पशुओं को खिलाने पर दूध की मात्रा में इजाफा होता है।

अनुकूल है जलवायु

चिकोरी के लिए उष्णीय जलवायु अनुकूल मानी जाती है। जिसके लिए पश्चिमी राजस्थान अच्छा माना गया है। रानीवाड़ा क्षेत्र में अभी इसका प्रयोग किया जा रहा है अगर यह सफल होती है तो अन्य किसान भी इसे अपना सकेंगे। जिससे उन्हें अतिरिक्त आया हो सकेगी।

किसानों के लिए फायदेमंद

रा नीवाड़ा में इसे अभी प्रायोगिक तौर पर किया जा रहा है, लेकिन अगर यह सफल होती है तो इसका किसानों को फायदा होगा। खेती की सार संभाल कर रहे सोमाराम मेघवाल ने बताया कि चिकोरी की बुवाई सितम्बर में की जाती है तथा फरवरी में पौधा परिपक्व हो जाता है। जड़ों को थ्रेसर में छोटे-छोटे टुकड़ों में बदलने के बाद सुखाया जाता है। बाद में यह कॉफी में मिश्रण के लिए तैयार हो जाती है। उन्होंने बताया कि एक बीघा खेती में एक हजार रूपए का खर्चा होता है तथा इससे पन्द्रह हजार रूपए की आय अर्जित की जा सकती है। चिकोरी के हरे पौधे को पालतु व जंगली जानवर नष्ट नहीं करते हंै।