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Friday, 24 June 2011

सुंधा ट्रस्ट पर सरकारी साया


रानीवाड़ा। 
प्रसिद्ध शक्तिपीठ श्री सुंधामाता ट्रस्ट पर अब सरकारी साया पडने वाला है। देवस्थान विभाग उदयपुर ने ट्रस्ट की आय-व्यय की निगरानी के लिए जिला कलेक्टर को पत्र लिखकर ट्रस्ट को प्राप्त होने वाली राशि की गणना में पारदर्शिता एवं नियमितता को लेकर अधिकृत किया है।
जानकारी के मुताबिक, राजस्थान, गुजरात सहित देश के कई राज्यों के श्रद्धालुओं के लिए आस्था का केंद्र बने श्री सुंधामाता तीर्थ को संचालित करने वाले श्री चामुण्ड़ा माताजी मंदिर ट्रस्ट में पिछले कई वर्षों से अनियमितताए एवं धांधली की शिकायत मिल रही थी। इन शिकायतों को लेकर गत जिला परिषद की बैठक में विधायक रामलाल मेघवाल ने प्रस्ताव प्रस्तुत किया था, जिसका अनुमोदन सदन ने सर्व सम्मति से पारित कर ट्रस्ट की गतिविधियों एवं आय-व्यय में पारदर्शिता के लिए राज्य सरकार को पत्र लिखकर रिसीवर लगाने का निवेदन किया था। जिला कलेक्टर ने जिला परिषद के इस प्रस्ताव को क्रियान्वयन करने के लिए राज्य सरकार को भेजा जहांं से सरकार की सकारात्मक टिप्पणी के साथ देवस्थान विभाग उदयपुर को पत्र प्रेषित किया गया है। जिस पर देवस्थान विभाग ने 10 जून को जिला कलेक्टर जालोर को पत्र प्रेषित कर श्री चामुण्ड़ा माताजी ट्रस्ट, सुंधापर्वत, दांतलावास तहसील भीनमाल में प्रशासनिक अधिकारी को नियुक्त कर पारदर्शिता बनाए रखने के निर्देश दिए गए।
जिस पर जिला कलेक्टर के.के. गुप्ता 21 जून को नए निर्देश जारी कर श्री चामुण्ड़ा माताजी ट्रस्ट सुंधापर्वत में प्राप्त होने वाली राशि की गणना में पारदर्शिता एवं नियमितता के परिपेक्ष्य में मंदिर के भण्ड़ार तथा अन्य प्राप्त होने वाली भेंट राशि की गणना के लिए उपखंड अधिकारी, भीनमाल को मनोनित कर राज्य सरकार के निर्देशों की पालना करने के लिए पांबद किया है।
क्या है निर्देश :- सुंधामाता तीर्थ पर प्रतिमाह लाखों रूपए एवं सोने चांदी के गहनों की आवक होती है। अब नए निर्देशों के तहत ट्रस्ट के द्वारा संचालित भण्ड़ार को माह में एक बार निश्चित तिथि को एसडीएम के समक्ष खोला जाएगा। भण्ड़ार खोलने पर उसमें प्राप्त होने वाली राशि एवं अन्य सामग्री का लेखा-जोखा एसडीएम के समक्ष संधारित किया जाएगा। पूरा विवरण प्रत्येक माह मंदिर के पास ट्रस्ट कार्यालय के बाहर नोटिस बोर्ड पर एवं उपखंड कार्यालय भीनमाल में चस्पा किया जाएगा, ताकि कोई भी श्रद्धालु ट्रस्ट की आय-व्यय को पारदर्शिता पूर्वक देख सके। इसी तरह मंदिर के नाम पर काटी जाने वाली रसीदों एवं दी जाने वाली भैंटों अर्थात गहनों का हिसाब-किताब इसी दिन एसडीएम के समक्ष प्रस्तुत किया जाएगा। इसका सम्पूर्ण लेखा-जोखा नोटिस बोर्ड पर लगाना आवश्यक माना गया है। साथ ही ट्रस्ट की गतिविधियों, आय-व्ययों की जानकारी सहित नए होने वाले कार्यों की मासिक रिपोर्ट जिला कलेक्टर को प्रेषित करनी आवश्यक होगी।
क्या होगी भावी कार्यक्रम :- प्रशासनिक हल्कों से मिली जानकारी के अनुसार श्रीनाथजी मंदिर नाथद्वारा की तर्ज पर श्री सुंधामाता मंदिर का संचालन राज्य सरकार देवस्थान विभाग को सौंपेगा। इससे पूर्व प्रत्येक माह की निश्चित तिथि को एसडीएम के समक्ष खुलने वाले भण्ड़ारे में से निकलने वाली दान राशि एवं भैंट की गणना के लिए विडियों केमेरे एवं सीसी टी.वी. केमेरे लगाए जाएंगे, ताकि कोई भी श्रद्धालु मंदिर के बाहर भी खड़ा-खड़ा भण्ड़ारे से निकलने वाली राशि की गणना होते देख सकता है। गौरतलब यह है कि इस ट्रस्ट में कई वर्षों से लाखों रूपए के घोटाले होते आए है।
इनका कहना :-
-जिला परिषद जिले की सर्वोच्च लोकतांत्रिक संस्था होती है। गत बैठक में जनप्रतिनिधियों के द्वारा ट्रस्ट की गतिविधियों में अनियमितता को लेकर पारित किए गए प्रस्ताव पर देवस्थान विभाग ने निर्देश जारी कर आय-व्यय पर निगरानी के लिए प्रशासनिक अधिकारी लगाने का कहा है, जिस पर हमने भीनमाल एसडीएम को निगरानी के लिए नियुक्त कर दिया है और इन निर्देशों की जानकारी ट्रस्ट के सचिव एवं अध्यक्ष को भी दे दी है।
-केवल कुमार गुप्ता जिला कलेक्टर, जालोर
-राज्य सरकार ने वित्तिय व्यवस्थाओं की पारदर्शिता के लिए यह कदम उठाया है और अन्य बिंदुओं पर भी जल्द ही उचित कार्रवाई की जाएगी। इससे जो सुंधा पर्वती य तीर्थ स्थल के विकास की राह सुदृढ होगी।
-रतन देवासी विधायक, रानीवाड़ा

Wednesday, 22 December 2010

झील सी सुंदरता पर बबूल का दाग

राव गुमानसिंह 
रानीवाड़ा!
प्रकृति इस बार तहसील क्षेत्र पर जमकर मेहरबान हुई है। चारों ओर जहां पहाड़ हरियाली से घिरे नजर आते हैं वहीं क्षेत्र के झरनों से आज भी कलकल करता पानी बह रहा है। प्रकृति की इसी मेहरबानी से क्षेत्र का वणधर बांध में इन दिनों झील सा झूमता नजर आ रहा है। पिछले साल तक सूख चुके इस बांध में इस बार पानी की इतनी आवक हुई है कि यहां ना केवल मछली पालन हो रहा है बल्कि पर्यटकों के लिए नौकायन का भी अवसर है। ऐसे में यहां पर्यटन की संभावनाओं से इंकार नहीं किया जा सकता, लेकिन इस मनोहारी केंद्र को भी सरकारी बेपरवाही का खामियाजा भुगतना पड़ रहा है। बांध के चारों ओर जहां जगह जगह बबूल खड़ा है वहीं कई लोग अवैध रूप से मशील लगाकर इसका पानी खींच रहे हैं। जिसे रोकने के लिए कोई इंतजाम नहीं किए गए हैं। प्रकृति मेहरबानी, प्रशासन बेपरवाह : इस बांध पर भले ही प्रकृति मेहरबान हो गई हो, लेकिन सरकारी उदासीनता यहां भी दिखाई दे रही है। बांध के चारों ओर बबूल की झाडिय़ां उग आई हैं। जिसके कारण यहां गंदगी रहती है। अगर इन झाडिय़ों को साफ कर दिया जाए तो यहां का सौंदर्य और भी निखर सकता है। बांध के तल में भी बबूल होने के कारण नाव संचालन में परेशानी आती है। इसके अलावा कुछ लोग यहां अवैध रूप से मशीन लगाकर पानी खींचने का भी काम रहे हैं। जिस पर भी अंकुश जरूरी है। स्थानीय लोगों ने कई बार इस संबंध में सिंचाई विभाग को ज्ञापन भी सौंपा है। 

पर्यटन की हैं संभावनाए

रानीवाड़ा तहसील क्षेत्र में वन्य जीव, धार्मिक और ऐतिहासिक ट्यूरिज्म की अपार संभावनाएं हंै, लेकिन इस धरोहर को पर्यटन के लिहाज से न तो सरकार समझ पाई और न ही निजी क्षेत्र। सरकार ने भी पर्यटन सर्किट पर कम ध्यान दिया है। रानीवाड़ा व जसवंतपुरा पहाड़ों और जगलों की गोद में बसे हैं। दोनो क्षेत्रों में कई प्रसिद्ध पर्यटन स्थल हंै। रानीवाड़ा तहसील में वणधर व जेतपुरा बांध, सेवाड़ा का पातालेश्वर शिव मंदिर, सिलासन का सिलेश्वर मंदिर, वणधर की प्राचनी वावड़ी, कोटड़ा का आंद्रेश्वर मंदिर, कूड़ी महादेव मंदिर, रानीवाड़ा खुर्द के पहाड़ पर बिल्व वृक्षों का वन, बारहमासी सुकळ नदी, बडग़ांव गढ़ एवं जसवंतपुरा क्षेत्र में सुंधामाता मंदिर, भालू अभ्यारण्य, खोडेश्वर शिव मंदिर, कारलू बोटेश्वर मंदिर, जसवंतपुरा पर्वत पर मिनी माउंट समेत दर्जनों स्थल हैं। जहां हर साल सैकड़ों लोग आते हैं।

फिर होने लगा मछली उत्पादन

बांध में आया पानी यहां के लोगों के लिए रोजगार के नए अवसर लेकर आया है। कुछ सालों पूर्व तक बांध में मछली उत्पादन होता था, लेकिन बीच में बरसात की कमी के कारण यह काम बंद करना पड़ा। इस साल हुई बरसात के बाद आए पानी में अब एक बार फिर यहां मछली उत्पादन किया जा रहा है। इसके लिए यहां बाकायदा निविदा की गई है। जिसके बाद ठेकेदार ने बांध में मछली के बीज छोड़े हंै। अभी मछली का आकार छोटा है। फरवरी माह के बाद मछली बड़ी होने पर जाल से उन्हें एकत्रित किया जा सकेगा। इसी प्रकार यहां नौकायन का भी काम शुरू किया है। शुरू शुरू में नाव संचालन मछली उत्पादन के लिए किया जा रहा था, लेकिन अब यहां आने वाले लोगों की फरमाइश पर उन्हें भी इसकी सैर करवाई जाती है। लबालब भरे बांध में लोगों के लिए नाव में सफर करना रोमांचकारी होता है। फोटोग्राफी के शौकिन लोगों को यहां की साइट पसंद आने लगी है।

बांध के संरक्षण के लिए प्रयास कर कार्ययोजना बनानी चाहिए

-बांध के खूबसूरत किनारें पर्यटकों को लुभाने के लिए पर्याप्त हंै। सरकार एवं जिला प्रशासन को यहां पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए प्रयास कर कार्ययोजना बनानी चाहिए।

- मोड़ाराम मेघवाल, वणधर



-बांध में जंगली बबूल झाड़ी का रूप ले रहे हंै। जो कि इसकी सुंदरता के लिए दाग है। प्रशासन को बांध के सरंक्षण व संवर्धन के प्रयास करने चाहिए।

- पृथ्वीसिंह राठौड़, मछली पालक, वणधर

Wednesday, 8 December 2010

धोरों की धरती पर देश-विदेशी के परिंदे

रानीवाड़ा!
सुंधा पर्वत का आंचल इन दिनों कई विदेशी पक्षियों के कलरव से गूंज रहा है। इस बार हुई अच्छी बारिश ने इस इलाके को हरियाली से आच्छादित कर दिया और अब इसी हरियाली चादर में कितने ही पंछियों ने अपने आशियाने बना लिए हैं। इन मेहमान पक्षियों के आशियाने भी ऐसे होते हैं कि बस, देखते ही रह जाएं। कोई ऊंचे पेड़ पर मोटे से तने में तो कोई झाडिय़ों पर तिनके का बिछौना बनाए बैठा है। किसी किसी को धोरों की माटी से भी प्यार है तो उन्होंने छोटी छोटी घास में ही अपना डेरा डाला है। दिन भर यहां से वहां ऊंची उड़ाने भरने और चहकने के बाद ये पंछी रात को इन घोंसलों में जा दुबकते हैं।

विभिन्न प्रजातियों के पक्षियों के मनभावक कलरव से इन दिनों रेतीले धोरे गुंजायमान हो रहे है। विशेषकर किंगफिशर चिडिय़ा यहां लोगों का मन मोह रही है। एक देश से दूसरे देश हजारों किलोमीटर की यात्रा, ना जाने कितनी ही सीमाओं, नदियों और जंगलों को पार कर ये नन्हें मेहमान इन दिनों सुंधा क्षेत्र के खास बने हुए हैं। परदेश से उड़कर सुंधांचल में आने वाले परिन्दों में एक है, पतिरंगा। लंबी चोंच वाली इस चिडिय़ा को अंग्रेजी में ब्लू चीवड बी इटर्स कहते हंै। इस चिडिय़ा की लम्बाई एक फीट होती है। काफी तादाद में ये चिडिय़ां मरुस्थल सहित सुंधांचल में सुकळ नदी के दोनों किनारों पर पड़ी मिट्टी में घोंसला बनाती हैं और अंडे देती हैं। यहां पाए जाने वाले कीड़े-मकोड़ों को ये अपना आहार बनाती हंै। इनमें से काफी प्रजातियां भारतीय हैं जो देश के विभिन्न हिस्सों से यहां आती है और एक विदेशी प्रजाति पतिरंगा विदेशों से यहां आती है। अभी भी यहां कई ऐसे पक्षी हैं जिनकी पहचान नहीं की जा सकी है।

कई जातियां हंै प्रवास पर

सुकळ नदी क्षेत्र में पतिरंगा चिडिय़ा के अलावा किंगफिशर चिडिय़ा काफी तादाद में देखने को मिल रही है। क्षेत्र में गर्मियों में आई बया चिडिय़ा अब यहां से उडऩे की तैयारी कर रही है। सुंधांचल में आने वाले अन्य प्रवासी पक्षी हंै- फ्लाईकेचर, गोल्डन औरियल, कामोरेंट, मोरहंस जैकाना, ग्रैट स्पोटेड ईगल, किंगफिशर हेरोइन, आइबिस और क्रेन। यहां आने वाले भारतीय पक्षियों में पनकौआ, कौआक, खेरा, काला बाज, जांघिल, घोंचिल, गिरिया, पिट्टो, नीलकण्ठ, छोटा बाबुई बटन, गजपाउन, जंगली मैना, व्यामिनी मैना और उल्लू प्रमुख हंै। इन पक्षियों में प्रकाश का अनुभव करने व वातावरण में फैली गंध से परिचय स्थापित करने की भी बेजोड़ क्षमता होती है। ये पक्षी महक की अनुभूति के सहारे अपने घोंसलों तक आसानी से पहुंच जाते हैं। ये बहुत मंद ध्वनि सुनने में निपुण होते हैं। इनसे परिचय स्थापित कर ये अपना मार्ग बिना भटके ढूंढ लेते हंै।

पर्यटन की भारी संभावनाएं

ञ्चजिले को गोडवाड़ टूरिज्म सर्किट में जुड़वाने की तैयारी शुरू कर दी है। बाद में जिले में देशी-विदेशी पर्यटकों का आना शुरू हो जाएगा। सुंधांचल में पर्यटन की विपुल संभावनाएं है। इसके और भी बढ़ावे के प्रयास किए जाएंगे।

- रतन देवासी, विधायक रानीवाड़ा

Thursday, 3 June 2010

खेलों में भरवाया टैंकरों से पानी


रानीवाड़ा

सुंधा के पिछवाड़े क्षेत्र में गर्मी व प्यास से बंदरों की मौत की सूचना मिलने पर दानदाता व वन्यप्रेमी आगे आए हैं। उन्होंने जंगली क्षेत्र की कई खेलों में टैंकरों से पानी भरवाने की व्यवस्था की है।
भूतेश्वर मठ के महंत शंभुगिरी महाराज ने बताया कि सुंधा पर्वत के पीछे धोरों में पेयजल संकट के चलते कई वन्य प्राणी काल कलवित हो रहे हैं। वन विभाग द्वारा पेयजल मुहैया नहीं करवाने पर दानदाता परिवारों से गुहार की गई। धोरों में धाराल व वनार क्षेत्र में पक्की खेली बनाई गई है। उनमें रोजाना टैंकर द्वारा पेयजल पहुंचाया जा रहा है। अन्य कच्ची खेलियों में भी टैंकरों से पानी भरवा दिया गया है। इन खेलियों पर काफी वन्य जीव प्यास बुझाते हैं। उल्लेखनीय है कि गर्मी व प्यास से बड़ी संख्या में बंदरों की अकाल मौत तथा अन्य वन्य जीवों के पीने के पानी के लिए भटकने के मामले में दैनिक भास्कर में कुछ दिनों पूर्व समाचार प्रकाशित किया गया था।

Thursday, 6 May 2010

चौपाल आज

रानीवाड़ा ! राज्य सरकार के निर्देशानुसार प्रत्येक ग्राम पंचायत पर उपखंड अधिकारी की मौजूदगी में रात्रि चौपाल का आयोजन गुरूवार को मालवाड़ा में किया जाएगा। ग्रामसेवक मांगाराम देवासी ने बताया कि शाम 7 बजे चौपाल का शुभारंभ किया जाएगा, जिसमें सभी विभागों के अधिकारी व कर्मचारी विभागीय योजनाओं की जानकारी के साथ आवश्यक रूप से भाग लेंगे। चौपाल में दर्ज होने वाली समस्याओं का निस्तारण उपखंड कार्यालय में प्रत्येक सोमवार को होने वाली समीक्षा बैठक में किया जाएगा। उपखंड अधिकारी कैलाशचंद्र शर्मा ने बताया कि 13 मई को करड़ा, 20 मई को कागमाला व 27 मई को दहीपुर में भी इन चौपालों का आयोजन किया जाएगा।

Sunday, 4 April 2010

जल बिन जा रही बेजुबानों की जान

गुमानसिंह राव. रानीवाड़ा
पानी का संकट क्षेत्र के जंगलों में वन्य जीवों के लिए मौत का कारण बनता जा रहा है। यही हाल रहा तो इस बार अकाल के दौरान भारी संख्या में वन्यजीवों को दम तोडऩा पड़ सकता है। सुंधा पर्वत के आसपास के वन्य क्षेत्र में पिछले पखवाड़े के दौरान करीब चार दर्जन बंदरों की मौत हो गई। साथ ही अन्य वन्य जीवों पर भी इसका असर पड़ रहा है। खुद वन विभाग मान रहा है कि पानी की कमी इन जीवों के लिए जान लेवा साबित हो रही है और उसका कोई उपाय भी नहीं है। इधर, कुछ माह पूर्व ही चितलवाना के निकट नर्मदा नहर में पाली गई मछलियों के जीवन पर भी पानी के कारण संकट छाने लगा है। मछली उत्पादन कर रहे ठेकेदार की पानी के बहाव में आ रही कमी के कारण चिंता बढ़ गई है, क्योंकि पानी की कमी के कारण वहां मछलियां नहीं पनप रही हैं। शेष&पेज 9

मशीनों से खींच लेते हैं पानी

नर्मदा का ओवरफ्लो पानी लूणी व सूकड़ी नदी में छोड़ा गया था। अब यहां पानी की आवक बंद कर दी गई है। नदी क्षेत्र के आसपास के किसान अपने खेतों में सिंचाई के लिए इस पानी को मशीनों से खींच रहे हैं। जिससे दिनों दिन यहां पानी की कमी होती जा रही है। पानी के अभाव में ये मछलियां मरती जा रही हैं।

वन्य प्रेमी आया आगे

पूरण गांव के छत्तरसिंह देवल ने मूक जीवों की जान बचाने के लिए पहल की है। उसने स्वंय के टैं्रक्टर से धोरों में पेयजल पहुंंचाने का काम शुरू किया है। गर्मी के मौसम में पेयजल संकट से जंगली जानवरों को राहत पहुंचाने को लेकर जंगलों में कच्ची टंकियों को खेल के रूप में रखवा कर प्रतिदिन टैंकर से भरवाने का कार्य यह युवक कर रहा है। रोजाना सुबह देवल इस काम में लग जाते है। उन्होंने बताया कि इस क्षेत्र में काफी तादात में वन्य जीव पानी के प्यास से मारे जा चुके है।

क्यों गहराया जलसंकट

इस क्षेत्र में जल संकट का मुख्य कारण सुकळ नदी का सूख जाना है। जिले में लगातार तीन साल से अच्छी बरसात नहीं हो रही है। सुंधा पर्वत के आसपास जंगलों से घिरे और सुंधा पर्वत से सटे पूरण व कैर गांव के निकट बहने वाली इस बारहमासी सुकळ नदी के सूख जाने से परंपरागत पेयजल स्रोत सूख गए हैं। इससे पास में स्थित दो एनीकट सूख गए हैं। पूरे पर्वतीय क्षेत्र के आसपास जंगली जानवरों के लिए पीने का पानी नहीं बचा है। वन विभाग की ओर से खेली भी नही बनाई हुई है, जबकि विभाग वन्य जीवों को पेयजल मुहैया कराने के लेकर बड़े दावे कर रहा है।

मछलियों के जीवन पर संकट

चितलवाना. करीबन साल भर पहले शुरू हुई नर्मदा नहर में पानी की आवक को देखते हुए एक ठेकेदार ने इस पानी को मछली उत्पादन के लिए उपयोगी मान कर उसमें करीबन 35 लाख बीज डाले थे, लेकिन 15 मार्च से बंद हुई पानी की आवक के चलते इन मछलियों पर भी संकट गहरा गया है। निकटवर्ती केरियां और गांधव के बीच लूणी व सूकड़ी नदी में नर्मदा नहर के ओवरफ्लो से डाले गए पानी के सूख जाने से अब ये मछलियां मरती जा रही हैं। नहर में बंद हुई पानी की आवक के साथ अब ओवरफ्लो से इक_ा हुआ पानी भी सूखने के कगार पर है। पानी की आवक बंद होने के कारण मछलियां कीचड़ में फंस कर मरने लगी हैं। इससे मछली उत्पादन के कार्य में काफी रुकावट आ रही है।

बिखरे पड़े हैं बंदरों के शव

सुंधा पर्वत के आसपास जंगलों से घिरे और सुंधा पर्वत से सटे पूरण व कैर गांव के पर्वतीय क्षेत्रों में काले मुंह वाले बंदरों के शव बिखरे पड़े हैं। इस क्षेत्र में करीब ४० बंदरों के शव पड़े हैं जो अकाल में मौत का शिकार हो गए। इस क्षेत्र में दूर दूर तक पानी का कोई साधन नहीं है। जलस्रोत सूखे पड़े हैं और वन विभाग की ओर से भी कोई व्यवस्था नहीं है। काले मुंह के बंदरों के अलावा इस क्षेत्र में जरख, सियार, लकड़बग्गा, रीछ सहित कई वन्य जीव हैं। पानी की कमी के कारण रीछों का तो गांव में आना रोज की घटना है। इसी प्रकार यहां के धोरों में कुलाचे मारते काले हरिण को भी पानी का संकट झेलना पड़ रहा है। पानी की तलाश में झुंड में हरिण गांवों की ओर आने लगे हैं। पूरण गांव से ८ किमी दूर दुर्गम क्षेत्र वणार व धाराल तक के बीच के वन क्षेत्र में हरिणों की प्यास बुझाने वाले एनीकट सूख गए हैं।

-जंगली जानवरों को पानी सप्लाई के लिए बजट का प्रस्ताव विभाग के उच्चाधिकारियों को भिजवाया गया गया है। वैसे पूरे क्षेत्र में सैकड़ों की तादात में बंदर सहित कई जीव मारे जा रहे हंै। पर्वत के टॉप पर पेयजल उपलब्ध करवाना नामुमकिन है। अब इनका भगवान ही मालिक है।

-अनिल गुप्ता, क्षेत्रीय वन अधिकारी, जसवंतपुरा

पहले नर्मदा नहर में पानी की आवक के दौरान मछली पानी के तेज बहाव में आ जाने से मर जाती थी और अब आवक बंद होने के बाद लगातार पानी की कमी से मछलियां गड्ढों व कीचड़ में फंस जाती हैं।

- मोहम्मद इस्माइल खां, मछली ठेकेदार, जोधपुर

Monday, 15 March 2010

वन मित्रों के चयन की प्रक्रिया शुरू हुई

रानीवाड़ा& तेरह हजार हैक्टेयर से अधिक वन क्षेत्रफल वाले सांचौर व रानीवाड़ा क्षेत्र में वनों की सुरक्षा के लिए नए प्रहरियों के आने की तैयारी हो गई है। कुछ समय बाद वन मित्रों को क्षेत्र के अलग-अलग क्षेत्रों में नियुक्ति मिल जाएगी। राज्य में वन विभाग व जनता के बीच सेतु का कार्य करने की दृष्टि से विभिन्न रेंज क्षेत्रों में वन मित्रों की नियुक्ति के तहत रेंज में पांच वन मित्र लगाए जाने हैं। दिसम्बर में उच्चाधिकारियों के निर्देशों के बाद क्षेत्रीय वन अधिकारी को भर्ती प्रक्रिया शुरू करने को कहा गया था, लेकिन बाद में आचार संहिता लागू होने से यह प्रक्रिया अटक गई थी, लेकिन अब इसे फिर गति मिली है।

आए प्रस्ताव : वन विभाग सूत्रों के अनुसार वन मित्रों की भर्ती एक समिति के माध्यम से होगी। इस समिति में सम्बंधित पंचायत का सरपंच, वन सुरक्षा समिति का अध्यक्ष व विभाग का वनपाल या रेंजर शामिल है। मंडल वन कार्यालय को आधी जगहों से तो वन मित्रों के चयन के प्रस्ताव मिल चुके हैं वहीं शेष जगहों से प्रस्ताव आ रहे हैं।

ञ्चक्षेत्र में वन मित्रों को मंडल स्तर से आवश्यक प्रक्रिया के बाद नियुक्ति दी जाएगी। पहले उन्हें प्रशिक्षण दिया जाएगा। प्रति माह १५ सौ रूपए मानदेय के रूप में दिए जाएंगे।

-नाहरसिंह सिनसिनवार, क्षेत्रीय वन अधिकारी रेंज रानीवाड़ा व सांचौर